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उज्जैन · श्री सूर्य
छठ पूजा भारत के सर्वाधिक कठोर और अनुशासित व्रतों में से एक है। यह कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। इस पर्व में सूर्यदेव और उनकी पत्नी उषा (छठी माई) की उपासना की जाती है — मुख्यतः अस्त होते और उगते सूर्य को अर्घ्य देकर।
द्रौपदी ने पांडवों के वनवास के दौरान सूर्योपासना से अपने परिवार की रक्षा की। कर्ण — सूर्यपुत्र — प्रतिदिन नदी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे और याचकों को दान करते थे। इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए आज भी भक्त घुटने तक पानी में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं।
नहाय खाय — पवित्र स्नान और सात्विक भोजन। खरना — दिनभर उपवास के बाद रात्रि में गुड़-खीर और रोटी का प्रसाद। संध्या अर्घ्य — नदी या तालाब के तट पर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य। उषा अर्घ्य — भोर में उगते सूर्य को अर्घ्य — व्रत का समापन।
छठ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता है अस्त होते सूर्य की उपासना — जो हिंदू परंपरा में अत्यंत दुर्लभ है। यह पर्व मुख्यतः बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में मनाया जाता है। प्रवासी बिहारी समुदाय के कारण आज यह पर्व मुंबई, दिल्ली और विदेशों में भी लाखों लोग मनाते हैं।
छठ पूजा सूर्य देव और षष्ठी माता (छठी मईया) को समर्पित सबसे पवित्र व्रत है। चार दिनों के कठोर उपवास के साथ यह पर्व शरीर और आत्मा को शुद्ध करता है, समृद्धि प्रदान करता है और मनोकामनाएँ पूर्ण करता है। व्रती डूबते और उगते सूर्य को जल में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं।
⏱ समय उज्जैन के अनुसार · तिथि व नक्षत्र सम्पूर्ण भारत में समान
छठ पूजा का प्रथम दिन — व्रती स्नान कर शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। लौकी (कद्दू) की सब्ज़ी, चने की दाल और अरवा चावल का भोजन बनता है। इस दिन से मन और शरीर की शुद्धि आरम्भ होती है।
दूसरे दिन व्रती दिन भर उपवास रखता है और शाम को सूर्यास्त के बाद खीर-रोटी का प्रसाद बनाकर छठी मइया को अर्पित करता है। प्रसाद ग्रहण के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत आरम्भ होता है।
तीसरे दिन सूर्यास्त के समय व्रती नदी या तालाब में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य (जल अर्पण) देते हैं। सूप में ठेकुआ, फल, गन्ना और नारियल सजाकर अर्पित किया जाता है।
छठ पूजा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन — व्रती ब्रह्म मुहूर्त में घाट पर पहुँचकर उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य के बाद छठी मइया से आशीर्वाद लेकर व्रत का पारण किया जाता है।