तत्त्वमसि — वह तुम ही हो
तत्त्वमसि श्वेतकेतो
जिस परम सत्य को तुम बाहर खोज रहे हो, वह तुम्हारे भीतर ही है। जो चेतना समस्त सृष्टि में व्याप्त है, वही तुम्हारे हृदय में भी विद्यमान है।
उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु को नौ बार यह महावाक्य दोहराते हैं — "तत्त्वमसि" अर्थात् वह ब्रह्म तुम ही हो। यह उपनिषद् का सर्वोच्च संदेश है कि आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं। स्वयं को जान लेना ही ईश्वर को जान लेना है।
— छांदोग्य उपनिषद्
उठो, जागो और लक्ष्य तक मत रुको
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए। ज्ञान का मार्ग छुरे की धार के समान कठिन है, पर वीर ही उस पर चलकर अमरता को पाते हैं।
कठ उपनिषद् का यह मंत्र यम द्वारा नचिकेता को दिया गया उपदेश है। स्वामी विवेकानंद ने इसे भारत के युवाओं का जागरण-मंत्र बना दिया। यह हमें आलस्य और अज्ञान की नींद से जागकर आत्म-कल्याण के मार्ग पर दृढ़ता से बढ़ने की प्रेरणा देता है।
— कठ उपनिषद्
सत्यमेव जयते — सत्य की ही विजय होती है
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
अंततः सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य के मार्ग से ही वह दिव्य पथ खुलता है जिस पर चलकर ऋषिगण परम पद को प्राप्त करते हैं।
मुण्डक उपनिषद् का यह वाक्य भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है। यह विश्वास दिलाता है कि चाहे असत्य कितना ही प्रबल क्यों न दिखे, अंत में सत्य ही स्थायी रहता है। सत्य केवल नैतिक मूल्य नहीं, अपितु मोक्ष का मार्ग है।
— मुण्डक उपनिषद्
सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नाम देते हैं
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।
परम सत्य एक ही है, विद्वान लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। जिसे कोई राम कहता है, कोई अल्लाह, कोई प्रकृति — वह मूल तत्व एक ही है।
ऋग्वेद का यह मंत्र भारतीय दर्शन की उदारता का मूल है। यह सिखाता है कि सभी उपासना-पद्धतियाँ एक ही परम सत्य की ओर ले जाती हैं। इसी भाव से हिंदू चिंतन में सर्वधर्म समभाव और सहिष्णुता की जड़ें हैं।
— ऋग्वेद
वसुधैव कुटुम्बकम् — सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार है
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
यह अपना है और वह पराया — ऐसी गणना संकीर्ण मन वाले करते हैं। उदार हृदय वालों के लिए तो सम्पूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है।
महा उपनिषद् का यह श्लोक भारतीय विश्वबंधुत्व का उद्घोष है। यह हमें भेदभाव की संकीर्ण दृष्टि से ऊपर उठकर समस्त प्राणियों को अपना समझने की उदार दृष्टि प्रदान करता है।
— महा उपनिषद्
कर्म करो, फल की चिंता मत करो
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए न फल की इच्छा से कर्म करो, न ही कर्म छोड़ने में आसक्त हो।
गीता का यह श्लोक निष्काम कर्म का सार है। श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि परिणाम की चिंता में उलझने के बजाय अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा से करना चाहिए। यही मन की शांति और सफलता का मार्ग है।
— श्रीमद्भगवद्गीता
स्वयं को जानो
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते।
जो प्रत्येक अनुभव के पीछे विद्यमान चेतना को पहचान लेता है, वही अमरता को प्राप्त करता है। जिस शक्ति से आँख देखती है और मन सोचता है, उसी को जान लेना सच्चा ज्ञान है।
केन उपनिषद् प्रश्न करता है — यह मन किसकी प्रेरणा से चलता है? उत्तर है — उस चेतन तत्व से जो इंद्रियों के भी पीछे है। स्वयं की उस मूल चेतना को पहचानना ही जीवन का परम लक्ष्य है।
— केन उपनिषद्
अन्न ब्रह्म है — भोजन का सम्मान करो
अन्नं न निन्द्यात्। तद्व्रतम्।
अन्न की निंदा मत करो — यह एक व्रत है। जो अन्न जीवन को धारण करता है, उसका आदर करना और उसे बाँटकर खाना ही धर्म है।
तैत्तिरीय उपनिषद् अन्न को ब्रह्म का रूप मानता है, क्योंकि समस्त प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते और जीते हैं। यह उपदेश भोजन के प्रति कृतज्ञता और उसे बाँटकर ग्रहण करने की उदार भावना सिखाता है।
— तैत्तिरीय उपनिषद्
वैदिक ज्ञान क्या है?
वेद, उपनिषद् और गीता भारतीय अध्यात्म की आधारशिला हैं। इनमें जीवन, आत्मा और परमात्मा के गूढ़ रहस्यों को सरल सूत्रों में पिरोया गया है। यहाँ प्रस्तुत ज्ञान इन्हीं ग्रंथों के अमर संदेशों को सहज हिंदी में प्रस्तुत करता है, ताकि प्रत्येक जिज्ञासु इन्हें अपने जीवन में उतार सके।
वेद — ज्ञान का स्रोत
वेद चार हैं — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ये विश्व के प्राचीनतम ग्रंथों में गिने जाते हैं और इनमें ऋचाएँ, यज्ञ-विधि, संगीत तथा जीवन-विज्ञान समाहित है। "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" जैसे मंत्र वैदिक चिंतन की उदारता का परिचय देते हैं।
उपनिषद् — आत्मा का दर्शन
उपनिषद् वेदों का अंतिम भाग हैं, इसीलिए इन्हें "वेदान्त" कहा जाता है। ये गुरु-शिष्य संवाद के रूप में आत्मा और ब्रह्म के एकत्व का बोध कराते हैं। "तत्त्वमसि", "अहं ब्रह्मास्मि" और "सत्यमेव जयते" जैसे महावाक्य इन्हीं की देन हैं।
गीता — कर्म और भक्ति का समन्वय
श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का अंश है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्म, ज्ञान और भक्ति का उपदेश देते हैं। "कर्मण्येवाधिकारस्ते" इसका सर्वप्रिय सूत्र है जो फल की चिंता किए बिना कर्तव्य-पालन की प्रेरणा देता है।