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सभी समय गाज़ियाबाद के अनुसार हैं
पंचांग (या पञ्चाङ्ग) एक प्राचीन हिन्दू खगोलीय कैलेंडर है जो सूर्य, चंद्रमा और नवग्रहों की सटीक गणनाओं पर आधारित है। संस्कृत में 'पंच' का अर्थ है पाँच और 'अंग' का अर्थ है भाग — इस प्रकार यह शब्द इसके पाँच मूल तत्वों को इंगित करता है। तीन सहस्राब्दियों से अधिक समय से यह भारतीय समाज के धार्मिक, सामाजिक और कृषि जीवन का आधार रहा है।
तिथि सूर्य और चंद्रमा के बीच के कोण में प्रत्येक १२° की वृद्धि से निर्धारित होती है। एक चंद्र मास में ३० तिथियाँ होती हैं — शुक्ल पक्ष में १५ (प्रतिपदा से पूर्णिमा) और कृष्ण पक्ष में १५ (प्रतिपदा से अमावस्या)। चंद्रमा की गति असमान होने के कारण एक तिथि १९ से २६ घंटे तक की हो सकती है। एकादशी, प्रदोष और पूर्णिमा जैसी तिथियाँ विशेष पूजा और व्रत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
सप्ताह के सात दिन सात ग्रहों से शासित हैं — रविवार (सूर्य), सोमवार (चंद्र), मंगलवार (मंगल), बुधवार (बुध), गुरुवार (बृहस्पति), शुक्रवार (शुक्र) और शनिवार (शनि)। प्रत्येक वार का अपना शुभ-अशुभ स्वभाव और देवता होता है।
आकाश के क्रांतिवृत्त को २७ समान भागों (प्रत्येक १३°२०') में बाँटा गया है जिन्हें नक्षत्र कहते हैं। चंद्रमा लगभग २७.३ दिनों में सभी २७ नक्षत्रों से गुज़रता है। प्रत्येक नक्षत्र का एक अधिष्ठाता देवता, स्वामी ग्रह, स्वभाव और प्रतीक होता है। कभी-कभी मुहूर्त गणना में अभिजित नाम का २८वाँ नक्षत्र भी प्रयुक्त होता है।
सूर्य और चंद्रमा की संयुक्त भोगांश-राशि को १३°२०' से भाग देने पर २७ योग प्राप्त होते हैं। इनमें सिद्ध, शुभ, शिव जैसे शुभ योग और व्यतीपात, वैधृति जैसे अशुभ योग होते हैं। विशेष संयोगों से सर्वार्थसिद्धि योग और अमृतसिद्धि योग बनते हैं जो अत्यंत शुभ माने जाते हैं।
करण तिथि का आधा भाग होता है — लगभग ६ घंटे। कुल ११ करण हैं जिनमें ७ चर (बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि) और ४ स्थिर (शकुनि, चतुष्पाद, नाग, किंस्तुघ्न) हैं। विष्टि करण (भद्रा) अशुभ माना जाता है और इसमें शुभ कार्य वर्जित हैं।
किसी भी महत्वपूर्ण कार्य — विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार आरंभ, वाहन क्रय, नामकरण, यज्ञोपवीत — के लिए शुभ मुहूर्त निकाला जाता है। ज्योतिषी तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण के संयोग से सर्वोत्तम समय खोजते हैं।
हिन्दू धर्म के प्रत्येक व्रत और त्योहार की तिथि पंचांग से निर्धारित होती है — दीपावली कार्तिक अमावस्या को, होली फाल्गुन पूर्णिमा को, जन्माष्टमी भाद्रपद अष्टमी को।
ऋग्वेद में खगोलीय घटनाओं के उल्लेख मिलते हैं। 'वेदांग ज्योतिष' (लगभग १२०० ईसा पूर्व) भारत का प्राचीनतम खगोल-विज्ञान ग्रंथ है जो मुख्यतः वैदिक यज्ञों के समय-निर्धारण हेतु लिखा गया था।
आर्यभट्ट (आर्यभटीय, ४९९ ई.), ब्रह्मगुप्त (ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त, ६२८ ई.) और वराहमिहिर (पञ्चसिद्धान्तिका) ने खगोल गणना को नई ऊँचाई दी। आर्यभट्ट ने सौर वर्ष की लंबाई ३६५.३५८ दिन आँकी जो आधुनिक मान के अत्यंत निकट है।
भारत में दो मुख्य पंचांग पद्धतियाँ हैं — अमांत (दक्षिण और पश्चिम भारत में, माह अमावस्या पर समाप्त होता है) और पूर्णिमांत (उत्तर भारत में, माह पूर्णिमा पर समाप्त होता है)। आज के युग में पंचांग कम्प्यूटर-आधारित सॉफ्टवेयर से तैयार होते हैं, परंतु उनका गणितीय आधार वही शास्त्रीय सिद्धान्त हैं जो सहस्राब्दियों पुराने हैं।

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