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बैंगलोर · मार्गशीर्ष · शुक्ल पक्ष
मोक्षदा एकादशी व्रत से व्रती को और उनके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी दिन भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इसे गीता जयंती भी कहते हैं।
सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक व्रत। विष्णु को तुलसी अर्पित करें।
यह गीता जयंती भी है — इसी दिन भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इस दिन गीता-पाठ से सहस्र गो-दान का पुण्य मिलता है।
दशमी सायं: एकादशी व्रत का संकल्प लें
एकादशी प्रातः: सूर्योदय से पूर्व उठें; मृत्तिका मंत्र के साथ स्नान करें
वेदी पर भगवान विष्णु / विशेष देवता की प्रतिमा स्थापित करें
तुलसी पत्र, ताजे पुष्प, चन्दन, धूप और घी का दीपक अर्पित करें
संकल्प मंत्र बोलें: 'एकादश्यां निराहारः...'
दिन भर प्रार्थना, विष्णु सहस्रनाम-पाठ या भजन में लगे रहें
रात्रि जागरण: भक्तों के साथ भजन-कीर्तन करते हुए जागते रहें
द्वादशी प्रातः: पूजन पूर्ण करें, सूर्योदय के बाद पारण करें
ब्राह्मण-भोजन कराएं, यथाशक्ति दान करें और आशीर्वाद लें
दामोदर को तुलसी मंजरी अर्पित करें — इससे पितरों को मोक्ष मिलता है
पूजा के बाद पुण्य का अर्पण पितरों को करें
भगवद्गीता का दान
सोना या तिल-दान
ब्राह्मण-भोजन
एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि। भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥
O Pundarikaksha! I shall fast on Ekadashi and eat on the following day. O Achyuta, be my refuge and support.
अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे। मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसञ्चितम्॥
O Earth, trodden by horses, chariots, and Lord Vishnu — cleanse me of all sins accumulated in the past.
एकादशी संस्कृत के दो शब्दों से बनी है — एकादश अर्थात् ग्यारह। यह हिन्दू चंद्र मास की ग्यारहवीं तिथि है जो प्रत्येक पक्ष — शुक्ल और कृष्ण — में एक बार आती है। इस प्रकार वर्ष में कुल २४ एकादशियाँ होती हैं (अधिक मास में २६)। यह तिथि भगवान श्री विष्णु को समर्पित है और इसे सनातन धर्म में सर्वश्रेष्ठ व्रत-तिथियों में गिना जाता है।
पुराणों के अनुसार प्राचीन काल में मुर नामक महाबली दैत्य ने तीनों लोकों को आतंकित कर रखा था। देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु उससे युद्ध करने पहुँचे। दीर्घ युद्ध के पश्चात् भगवान एक गुफा में विश्राम करने लगे। मुर ने सोते हुए विष्णु पर आक्रमण करने का प्रयास किया, तब उनके शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई — यही एकादशी देवी थीं। उन्होंने मुर का वध किया। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कहा: "आज से यह तिथि एकादशी के नाम से जानी जाएगी, और जो भक्त इस दिन व्रत रखेंगे वे मेरी विशेष कृपा के पात्र होंगे।"
निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ शुक्ल) — वर्ष की सबसे कठिन और सर्वाधिक पुण्यदायिनी; जल तक वर्जित। देवशयनी एकादशी (आषाढ़ शुक्ल) — भगवान विष्णु चार माह के शयन में जाते हैं; चातुर्मास आरम्भ। देवउठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल) — विष्णु जागते हैं; तुलसी विवाह और शुभ कार्य पुनः आरम्भ। वैकुण्ठ एकादशी (मार्गशीर्ष) — वैकुण्ठ के द्वार खुलते हैं; दक्षिण भारत में अत्यन्त पूजनीय। पापमोचनी एकादशी (चैत्र कृष्ण) — समस्त पापों से मुक्ति; नये वर्ष से पहले आत्मशुद्धि।
एकादशी व्रत दशमी की संध्या से आरम्भ होता है। दशमी को रात्रि भोजन में मसूर, चना, उड़द और मांस वर्जित हैं। एकादशी को चावल, गेहूँ, जौ सहित सभी अन्न और फलियाँ पूर्णतः वर्जित हैं। फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, सेंधा नमक से बने सात्त्विक आहार ग्रहण किए जा सकते हैं। संपूर्ण निर्जला व्रत रखने वाले जल भी नहीं पीते।
एकादशी व्रत का समापन द्वादशी को सूर्योदय के बाद, हरि वासर समाप्त होने पर पारण करके होता है। पारण में देरी से पुण्य क्षीण होता है, अतः समय पर पारण आवश्यक है।
भागवत पुराण और पद्म पुराण के अनुसार एकादशी व्रत पापों का नाश, मन की शुद्धि और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। नारद पुराण में कहा गया है कि "एकादशी के दिन जो व्यक्ति अन्न नहीं खाता वह सभी तीर्थों में स्नान का फल पाता है।" यह व्रत इन्द्रियों पर संयम, आत्मचिन्तन और भगवान विष्णु की भक्ति का सर्वोत्तम अवसर है।
आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है कि चंद्रमा का मानव शरीर पर प्रभाव पड़ता है। एकादशी तिथि पर चंद्रमा की स्थिति विशेष होती है जिससे मानसिक उत्तेजना अधिक रहती है। उपवास से पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है, शरीर का ऑटोफेजी (कोशिका-शुद्धि) प्रक्रिया सक्रिय होती है और मन शांत व एकाग्र होता है — जो ध्यान और भक्ति के लिए सहायक है।