अध्याय 1 — मोक्षदा एकादशी की विधि और महत्त्व
युधिष्ठिर ने पूछा — प्रभो! मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का क्या नाम है और उसका माहात्म्य क्या है? भगवान ने कहा — राजन्! इसका नाम मोक्षदा एकादशी है। इसके श्रवणमात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। इस दिन तुलसी और धूप-दीप से भगवान दामोदर का पूजन करना चाहिये। शुक्लपक्षकी “मोक्षा'
एकादशीका माहात्म्य युथिष्ठिर बोले--देवदेवेश्वर ! मैं पूछता हूँ--मार्गशीर्ष मासके एकादशी होती है, उसका क्या नाम है ? कौन-सी विधि है
तथा उसमें किस देवताका पूजन किया जाता है ? Ah! यह सब
यथार्थरूपसे बताइये | श्रीकृष्णने कहा--नृपश्रेष्ठ ! मार्गशीर्ष मासके कृष्णपक्षमें 'उत्पत्ति'
नामकी एकादशी होती है, जिसका वर्णन मैंने तुम्हारे समक्ष कर दिया है।
अब एकादशीका वर्णन करूँगा, जिसके श्रवणमात्रसे वाजपेय
यज्ञका फल मिलता है। उसका नाम है--'मोक्षा' एकादशी, जो सब
पापोंका अपहरण करनेवाली है। राजन् ! उस दिन यत्रपूर्वक तुलसीकी
मझरी तथा धूप-दीपादिसे भगवान् दामोदरका पूजन करना चाहिये | पूर्वोक्त
१२ एकादशी-ब्रतका माहात्म्य रे है हरे है डरे है है डे जे हे डर कि है हरे है है #ए हरे हर डरे ैर है हरे है मी है ही हैँ है डरे हरे हे हरे है ही डरे डरे हरे है रे हैए डरे हरे की है हे है हे फहे डहे हरे डरे #हे हे हरे है है डे की की हे है के डे के विधिसे ही दशमी और एकादशीके नियमका पालन करना उचित है।
‘’ एकादशी बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली है। उस दिन सात्रिमें
मेरी प्रसन्नताके लिये नृत्य, गीत और स्तुतिके द्वारा जागरण करना चाहिये।
जिसके पितर पापवश नीच योनिमें पड़े हों, वे इसका पुण्य दान करनेसे
मोक्षको प्राप्त होते हैं। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है| पूर्वकालकी बात है,
वैष्णवोंसे विभूषित परम र्मणीय चम्पक नगरमें वैखानस नामक राजा रहते
थे। वे अपनी प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन करते थे। इस प्रकार राज्य करते
हुए राजाने एक दिन रातको स्वप्रमें अपने पितरोंको नीच योनिमें पड़ा हुआ
देखा। उन सबको इस अवस्थामें देखकर राजाके मनमें बड़ा विस्मय हुआ
और ग्रातःकाल ब्राह्मणोंसे उन्होंने उस HH सारा हाल कह सुनाया।
राजा बोले--ब्राह्मणो | मैने अपने पितरोंको नरकमें गिरा देखा है।
वे बास्म्बार रोते हुए मुझसे यों कह रहे थे कि 'तुम हमारे तनुज हो, इसलिये
इस नरक-समुद्रसे हमलोगोंका उद्धार करो |” द्विजवरो ! इस रूपमें मुझे
पितरोंके दर्शन हुए हैं। इससे मुझे चैन नहीं मिलता। क्या करूँ, कहाँ
जाऊँ ? मेरा हृदय रुँधा जा रहा है। द्विजोत्तमो ae , वह तप और
वह योग, जिससे मेरे पूर्वज तत्काल नरकसे छुटकारा पा जाय, बतानेकी
कृपा करें। मुझ बलवान् एवं साहसी पुत्रके जीते-जी मेरे माता-पिता घोर
नरकमें पड़े हुए हैं| अतः ऐसे पुत्रसे क्या लाभ है।
ब्राह्मण बोले--राजन् | यहाँसे निकट ही पर्वत मुनिका महान् आश्रम है।
वे भूत और भविष्यके भी ज्ञाता हैं | ) आप उन्हींके पास चले जाइये |
ब्राह्मणोंकी बात सुनकर महाराज ara शीघ्र ही पर्वत मुनिके
आश्रमपर गये ओर वहाँ उन मुनिश्रेष्ठको देखकर उन्होंने दण्डवत्-प्रणाम
करके मुनिके चरणोंका स्पर्श किया। मुनिने भी राजासे राज्यके सातों'
अज्लॉकी कुशल पूछी। १. राजा, Wel, राष्ट्र, किला, खजाना, सेना और मित्रवर्ग--ये ही परस्पर उपकार
करनेवाले राज्यके सात अड्ड हैं। है हे हे है के डे कै चत है।
न समत्रिमें
चाहिये।
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बात है,
जा रहते
ज्य करते
ड़ा हुआ
7 हुआ इसलिये
पमें मुझे
तप और
ब्रतानेकी
पता घोर श्रम है।
इये |
[-प्रणाम
' सातों'
अध्याय 2 — राजा वैखानस और पितरों की मुक्ति
र उपकार मार्गशीर्ष शुकुृपक्षकी ‘’ एकादशीका we "हे हे हे है हे उै हे और है हर मी मे है फीड है और अरे औ औ डे पर हे औै मे है हरे डे जे कै फ ैे हरे है मर हे औ हद औै हरे है हे को है जे अं a a hk राजा बोले--स्वामिन्! आपकी कृपासे मेरे राज्यके सातों सकुशल हैं। किन्तु मैंने eae देखा है कि मेरे पितर नरकमें पड़े हैं; अतः
बताइये किस पुण्यके प्रभावसे उनका वहाँसे छुटकारा होगा ? राजाकी यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ पर्वत एक मुहूर्त्ततक ध्यानस्थ रहे | इसके
बाद वे राजासे बोले--'महाराज ! मार्गशीर्ष मासके शुह्लपक्षमें जो Ate’
नामकी एकादशी होती है, तुम सब लोग उसका ad करो और उसका पुण्य
पितरोंको दे डालो | उस पुण्यके प्रभावसे उनका नरकसे उद्धार हो जायगा |’ भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं--युधिष्ठटिर ! मुनिकी यह बात सुनकर
राजा पुनः अपने घर लौट आये | जब उत्तम मार्गशीर्ष मास आया, तब राजा
वैखानसने मुनिके कथनानुसार 'मोक्षा' एकादशीका करके उसका पुण्य
समस्त पितरोंसहित पिताको दे दिया। पुण्य देते ही क्षणभरमें आकाशसे
फूलोंकी वर्षा होने लगी | वैखानसके पिता पितरोंसहित नरकसे छुटकारा पा
गये ओर STR आकर राजाके प्रति यह पवित्र वचन बोले--'बेटा |
तुम्हारा कल्याण यह कहकर वे स्वर्गमें चले गये। राजन् ! जो इस
प्रकार कल्याणमयी ‘’ एकादशीका व्रत करता है, उसके पाप नष्ट हो
जाते हैं और मरनेके बाद वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। यह मोक्ष देनेवाली
‘’ एकादशी मनुष्योंके लिये चिन्तामणिके समान समस्त कामनाओंको
पूर्ण करनेवाली है। इस माहात्म्यके पढ़ने और सुननेसे वाजपेय Agent फल
मिलता है। न्न्चच्औन्त्तत “ule मासकी ‘amen’ ओर “पुत्रदा'
नामक एकादशीका माहात्म्य युधिष्टिरने पूछा--स्वामिन् ! पौष मासके कृष्णपक्षमें जो एकादशी
होती है, उसका क्या नाम है ? उसकी क्या विधि है तथा उसमें किस
देवताकी पूजा की जाती है ? यह बताइये |
भगवान् श्रीकृष्णने कहा--राजेन्द्र । बतलाता हूँ, सुनो; बड़ी-बड़ी
दक्षिणावाले यज्ञोंसे भी मुझे उतना संतोष नहीं होता, जितना एकादशी- अनुष्ठानसे होता है। इसलिये सर्वथा प्रयल करके एकादशीका करना चाहिये। WS मासके कृष्णपक्षमें 'सफला' नामकी एकादशी होती
है। उस दिन पूर्वोक्त विधानसे ही विधिपूर्वक भगवान् नारायणकी पूजा
करनी चाहिये। एकादशी कल्याण HATS है। अतः इसका अवश्य
करना उचित है। जैसे नागोंमें शेषनाग, पक्षियोंमें गरुड़, देवताओंमें श्रीविष्णु
तथा APY ब्राह्मण श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सम्पूर्ण ब्रतोंमें एकादशी तिथि
OS है। राजन्! 'सफला' एकादशीको नाम-मन्त्नोंका उच्चारण करके
फलोंके द्वारा श्रीहरिका पूजन करे। नारियलके फल, सुपारी, बिजौरा नीबू,
जमीरा नीबू, अनार, सुन्दर आँवला, लौंग, बेर तथा विशेषतः आमके
HOM देवदेवेश्वर श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये | इसी प्रकार धूप-दीपसे भी अर्चना करे। 'सफला' एकादशीको विशेषरूपसे दीप-दान
करनेका विधान है। रातको वैष्णव पुरुषोंक साथ जागरण करना चाहिये |
जागरण करनेवालेको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह हजारों वर्ष तपस्या
करनेसे भी नहीं मिलता।
नृपश्रेष्ठ अब 'सफला' एकादशीकी शुभकारिंणी कथा सुनो।
चम्पावती नामसे विख्यात एक पुरी है, जो कभी राजा माहिष्मतकी राजधानी
थी। राजर्षि माहिष्मतके पाँच पुत्र थे। उनमें जो ज्येष्ठ था, वह सदा
पापकर्ममें ही लगा रहता था। परस््रीगामी और aso था। उसने
पिताके धनको पापकर्ममें ही खर्च किया। वह सदा दुराचारपरायण तथा में किस क्रादशी-
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शी होती
क्री पूजा
अवश्य
श्रीविष्णु
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गीप-दान
चाहिये |
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