आरती कीजे रघुनंदन की।
जो सुर नर मुनि जन सेवत आवे सेवा मंगलकारी॥
आरती कीजे रघुनंदन की।
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रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम।
भव बंधन से मुक्त करे, जग के पालनहार राम॥
आरती कीजे रघुनंदन की।
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कौशल्या के नंदन राम, दशरथ के सुत घनश्याम।
जानकी के पति राघव, जन जन के हृदय में राम॥
आरती कीजे रघुनंदन की।
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लखन भरत शत्रुघन संग, हनुमत सेवक अनुरंग।
सुग्रीव विभीषण मित्र बने, वानर सेना के संग॥
आरती कीजे रघुनंदन की।
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पंचवटी में आश्रम बसाया, लंकापति रावण को नाशाया।
सीता को मुक्त कर लाए, अयोध्या में राज जमाया॥
आरती कीजे रघुनंदन की।
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धनुष बाण धारण कर राजे, मर्यादा पुरुषोत्तम साजे।
नाम जपे जो भव से तरे, राम कृपा नित मन में भरे॥
आरती कीजे रघुनंदन की।
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आरती कीजे रघुनंदन की के बारे में
“आरती कीजे रघुनंदन की” राम की एक प्रिय आरती है, जिसे दीप जलाकर प्रातः एवं संध्या पूजा में गाया जाता है। नीचे इसके पूर्ण 6 पद शुद्ध हिंदी और रोमन (अंग्रेज़ी) लिप्यंतरण में दिए गए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आरती कीजे रघुनंदन की के बोल कहाँ पढ़ें?
आरती कीजे रघुनंदन की के पूर्ण बोल इसी पृष्ठ पर शुद्ध हिंदी में निःशुल्क उपलब्ध हैं। आप इन्हें ऑनलाइन पढ़ सकते हैं और आरती के समय गा सकते हैं।
आरती कीजे रघुनंदन की किस देवता की आरती है?
यह आरती भगवान राम को समर्पित है और उनकी पूजा-अर्चना के समापन पर गाई जाती है।
आरती कीजे रघुनंदन की कब और कैसे की जाती है?
आरती प्रातः या संध्या पूजा के अंत में की जाती है — घी या तेल का दीप जलाकर, उसे देवता के सम्मुख घुमाते हुए यह आरती गाई जाती है।
क्या आरती कीजे रघुनंदन की रोमन (अंग्रेज़ी) में उपलब्ध है?
हाँ, इस पृष्ठ पर आरती कीजे रघुनंदन की के बोल हिंदी के साथ-साथ रोमन लिप्यंतरण में भी दिए गए हैं, ताकि देवनागरी न पढ़ पाने वाले भी इसे गा सकें।