गले में बैजंती माला, बजावत मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
গগনम सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
◆
कटि पर करती है क्या शोभा, हरि चित्त चोर मन लोभा।
धन्य धन्य वही भाग्यशाली, जिसने ब्रज में जन्म लिया॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
◆
यमुना तट धेनु चराते, गोप-गोपी संग खेलाते।
चीर हरण नदी घाट करते, कालिया नाग को नाथ करते॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
◆
गोवर्धन धर नखन पर लीना, रास लीला रचाई यमुन्ना।
पूतना वध मातृ भाव धारी, दधि माखन भोग लेने हारी॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
◆
ब्रह्मा शंकर विष्णु राई, हैं सबके हृदय में समाई।
परमपिता परमात्मा सारी, जगत में फैली आनंद वाटिका॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
◆
श्री हरि की कृपा सब पाएँ, पापों से मुक्ति सब पाएँ।
प्रेम भक्ति से सेवा करते, चरणों में शीश नवाते॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
◆
कनक श्रृंग मोर मुकुट साजे, नयनों में प्रेम रंग छाजे।
जो जन भावे नित आरती गावे, सो जन मनोरथ पावे॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
❀
आरती कुंजबिहारी की के बारे में
“आरती कुंजबिहारी की” कृष्ण की एक प्रिय आरती है, जिसे दीप जलाकर प्रातः एवं संध्या पूजा में गाया जाता है। नीचे इसके पूर्ण 7 पद शुद्ध हिंदी और रोमन (अंग्रेज़ी) लिप्यंतरण में दिए गए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आरती कुंजबिहारी की के बोल कहाँ पढ़ें?
आरती कुंजबिहारी की के पूर्ण बोल इसी पृष्ठ पर शुद्ध हिंदी में निःशुल्क उपलब्ध हैं। आप इन्हें ऑनलाइन पढ़ सकते हैं और आरती के समय गा सकते हैं।
आरती कुंजबिहारी की किस देवता की आरती है?
यह आरती भगवान कृष्ण को समर्पित है और उनकी पूजा-अर्चना के समापन पर गाई जाती है।
आरती कुंजबिहारी की कब और कैसे की जाती है?
आरती प्रातः या संध्या पूजा के अंत में की जाती है — घी या तेल का दीप जलाकर, उसे देवता के सम्मुख घुमाते हुए यह आरती गाई जाती है।
क्या आरती कुंजबिहारी की रोमन (अंग्रेज़ी) में उपलब्ध है?
हाँ, इस पृष्ठ पर आरती कुंजबिहारी की के बोल हिंदी के साथ-साथ रोमन लिप्यंतरण में भी दिए गए हैं, ताकि देवनागरी न पढ़ पाने वाले भी इसे गा सकें।