राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं — सुनीति और सुरुचि। सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव था और सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम। एक दिन बालक ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठना चाहता था, परन्तु सौतेली माता सुरुचि ने उसे रोकते हुए कठोर वचन कहे — "राजा की गोद में बैठने का अधिकार केवल उसे है जिसने मेरी कोख से जन्म लिया हो। यदि तू भी यह स्थान चाहता है तो जा, तपस्या करके भगवान से प्रार्थना कर कि तू मेरे पुत्र के रूप में जन्म ले।"
पाँच वर्ष के ध्रुव का हृदय इन वचनों से बिंध गया। वह रोता हुआ अपनी माता सुनीति के पास पहुँचा। सुनीति ने उसे समझाया — "बेटा, जो दुःख तुझे मनुष्यों से मिला है, उसका निवारण केवल उस परमपिता के पास है जो सबका आश्रय है। तू भगवान नारायण की शरण में जा।"