निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य धनुर्विद्या सीखने की तीव्र लालसा रखता था। वह हस्तिनापुर पहुँचा और गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा देने की प्रार्थना की। किन्तु द्रोणाचार्य राजकुमारों के आचार्य थे और उस समय की मर्यादा के कारण उन्होंने एकलव्य को शिष्य बनाने से मना कर दिया।
एकलव्य निराश तो हुआ, पर उसका संकल्प नहीं टूटा। वह वन में लौट आया और वहीं रहकर अभ्यास करने का निश्चय किया।