देवता और असुर अमृत की प्राप्ति के लिए क्षीरसागर के मंथन पर सहमत हुए। मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया और नागराज वासुकि को नेती (रस्सी)। भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार लेकर डूबते पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया।
एक ओर से देवता और दूसरी ओर से असुर वासुकि को खींचने लगे। समुद्र से एक-एक करके चौदह रत्न निकले — कामधेनु, ऐरावत, कल्पवृक्ष, लक्ष्मी और अनेक दिव्य वस्तुएँ। किन्तु अमृत से पहले सागर ने कुछ और ही उगल दिया।