ॐ
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कबीर कहते हैं कि शरीर धारण करने का यही दंड है कि मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है—कर्म के इस नियम (धर्म) से कोई नहीं बच सकता। यह दोहा कर्म-फल के अटल सिद्धांत को स्पष्ट करता है।