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22 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
कबीर दास के मृत्यु पर दोहे जीवन की नश्वरता का गहरा बोध कराते हैं। "पानी केरा बुदबुदा" जैसे दोहे संसार की अनित्यता और समय रहते भक्ति का संदेश देते हैं। नीचे मृत्यु व नश्वरता पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित दिए गए हैं।
कबीर कहते हैं कि कल का काम आज कर लो और आज का काम अभी कर लो, क्योंकि पल भर में प्रलय (मृत्यु या विनाश) आ सकती है। यदि समय रहते काम न किया तो फिर कब करोगे? यह दोहा हमें आलस्य त्यागकर समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि मिट्टी कुम्हार से कहती है कि तू मुझे क्या रौंदता है? एक दिन ऐसा भी आएगा जब मैं तुझे (तेरे शव को अपने भीतर समाकर) रौंदूँगी। यह दोहा मनुष्य के अहंकार पर चोट करते हुए मृत्यु की अनिवार्यता और नश्वरता का स्मरण कराता है।
कबीर कहते हैं कि यदि लूट सकते हो तो राम-नाम के सुमिरन रूपी धन को लूट लो, अर्थात भरपूर भक्ति कर लो। नहीं तो बाद में पछताओगे जब प्राण शरीर छोड़कर चले जाएँगे। यह दोहा जीवित रहते ही प्रभु-भक्ति में लीन होने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि जो उदय हुआ है वह अस्त होगा, जो खिला है वह मुरझाएगा, जो बना है वह ढह जाएगा और जो इस संसार में आया है वह एक दिन अवश्य जाएगा। यह दोहा संसार की नश्वरता और अनित्यता का गहरा सत्य प्रकट करता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य को वही धन संचित करना चाहिए जो आगे (परलोक) में काम आए, अर्थात पुण्य और भक्ति का धन। सिर पर गठरी (सांसारिक धन) रखकर इस संसार से जाते हुए किसी को नहीं देखा गया। यह दोहा सांसारिक संग्रह की निरर्थकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब कोई किसी का नहीं रहेगा। मृत्यु के समय घर के लोग शरीर रूपी संगिनी (आत्मा) से कह देंगे कि अब यहाँ से चली जाओ। यह दोहा सांसारिक संबंधों की नश्वरता का स्मरण कराता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है। जैसे प्रातःकाल होते ही तारा छिप जाता है, वैसे ही यह शरीर भी एक दिन समाप्त हो जाएगा। यह दोहा जीवन की नश्वरता का गहरा बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि यह शरीर एक दिन चला जाएगा, इसलिए जब तक संभव है इसका सदुपयोग (भक्ति) कर लो। जिनके पास लाखों-करोड़ों की संपत्ति थी, वे भी खाली हाथ ही इस संसार से गए। यह दोहा धन-संग्रह की निरर्थकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि न माया मरी और न मन मरा, केवल शरीर बार-बार मरते रहे (जन्म-मरण होता रहा)। आशा और तृष्णा कभी समाप्त नहीं हुईं—ऐसा दास कबीर कह गए हैं। यह दोहा अंतहीन इच्छाओं और तृष्णा के बंधन को उजागर करता है।
कबीर कहते हैं कि राम-नाम के स्मरण रूपी अमूल्य धन को जितना लूट सको, लूट लो (भरपूर भक्ति कर लो)। नहीं तो अंत समय में पछताओगे, जब प्राण शरीर छोड़कर चले जाएँगे। यह दोहा जीवित रहते ही प्रभु-भक्ति की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि कभी अहंकार मत करो, क्योंकि काल (मृत्यु) ने तुम्हारे बाल पकड़ रखे हैं। पता नहीं कब और किस लोक में यह जीवन उड़कर चला जाए। यह दोहा अहंकार त्यागकर मृत्यु की अनिश्चितता का स्मरण कराता है।
कबीर कहते हैं कि जब तू जन्म लेकर संसार में आया तो सब हँसे और तू रोया। अब जीवन में ऐसे सत्कर्म कर कि जब तू संसार से विदा हो तो तू (संतोष से) मुस्कुराए और संसार तेरे वियोग में रोए। यह दोहा सार्थक और सत्कर्मों से भरा जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि चलती हुई चक्की को देखकर वे रो पड़े, क्योंकि उसके दो पाटों के बीच कोई दाना साबुत नहीं बचता। इसी प्रकार संसार रूपी चक्की (काल और माया) के बीच कोई जीव नहीं बचता। (संत यह भी कहते हैं कि जो कील रूपी सच्चे आश्रय—प्रभु—से चिपका रहे, वही बचता है।) यह दोहा संसार की नश्वरता का गहन बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि जो कुछ भी है वह सब ईश्वर का है, फिर तू उसे 'मेरा' क्यों कहता है? जब तू स्वयं ही नहीं रहेगा, तब तेरे लिए यह सुबह (सांसारिक वैभव) कहाँ रहेगी? यह दोहा 'मेरेपन' के मिथ्या अहंकार को उजागर करता है।
कबीर कहते हैं कि पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के मेल से यह शरीर बना है और इसी से आशा-तृष्णा उपजती है। जब यह शरीर अंततः मिट्टी में मिल जाएगा तो फिर इसके लिए रोना-धोना किस काम का? यह दोहा शरीर की नश्वरता और तृष्णा के मिथ्यापन को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि शरीर धारण करने का यही दंड है कि मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है—कर्म के इस नियम (धर्म) से कोई नहीं बच सकता। यह दोहा कर्म-फल के अटल सिद्धांत को स्पष्ट करता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य झूठे (क्षणिक) सुख को ही सच्चा सुख मानकर मन में प्रसन्न होता है। पर सारा संसार तो काल का चबेना (नाश्ता) है—कुछ उसके मुँह में है और कुछ गोद में रखा है, अर्थात सब क्रमशः काल का ग्रास बनेगा। यह दोहा सांसारिक सुख की क्षणभंगुरता दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि जो भी उत्पन्न होता है वह नष्ट होता ही है—वृक्ष, फूल, फल और पत्ते सभी। रात-दिन काल निरंतर आगे बढ़ता रहता है (और सबको अपने साथ ले जाता है)—इस सत्य को भली-भाँति समझ लो। यह दोहा संसार की अनित्यता का बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि जीवन बहुत छोटा है, फिर तू किस बात का अहंकार करता है? तू खाली हाथ इस संसार में आया था और खाली हाथ ही जाएगा—फिर तेरी यह शान किस काम की? यह दोहा जीवन की क्षणभंगुरता और अहंकार की निरर्थकता दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि हे मनुष्य! जीवन के ये थोड़े-से दिन रूपी नौबत (बाजे) को बजा ले, अर्थात इस अल्प जीवन का सदुपयोग कर ले। यह नगर, यह बस्ती और यह गली—इन्हें फिर लौटकर देखने को नहीं मिलेंगे। यह दोहा जीवन की क्षणभंगुरता और समय के सदुपयोग की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि बचपन हँसी-खेल में बीत गया और जवानी आलस्य व प्रमाद की नींद में चली गई। अब बुढ़ापे को आता देख मनुष्य खड़ा होकर पछताता है (कि भक्ति का समय गँवा दिया)। यह दोहा जीवन के हर चरण में समय के सदुपयोग की सीख देता है।
कबीर कहते हैं कि पल भर में प्रलय (मृत्यु) आ सकती है, फिर तू अपना काम कब करेगा? इसलिए कल का काम आज और आज का काम अभी कर ले। यह दोहा आलस्य त्यागकर तुरंत सत्कर्म और भक्ति में लग जाने की प्रेरणा देता है।