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76 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
कबीर दास के ज्ञान पर दोहे पुस्तकीय विद्या से बढ़कर आत्मज्ञान और विवेक का महत्व बताते हैं। ये दोहे सच्चे ज्ञान और जीवन-दर्शन की ओर प्रेरित करते हैं। पढ़िए ज्ञान पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित।
कबीर कहते हैं कि जब मैं संसार में बुराई ढूँढने निकला तो मुझे कोई बुरा नहीं मिला। परंतु जब मैंने अपने ही मन के भीतर झाँककर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं। तात्पर्य यह है कि दूसरों के दोष देखने के बजाय हमें पहले अपने भीतर के अवगुणों को पहचानकर उन्हें सुधारना चाहिए।
कबीर कहते हैं कि बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ते-पढ़ते सारा संसार समाप्त हो गया, फिर भी कोई सच्चा ज्ञानी न बन सका। असली पंडित (ज्ञानी) वही है जो प्रेम के ढाई अक्षर को पढ़ और समझ ले। तात्पर्य यह है कि पुस्तकीय ज्ञान से बढ़कर प्रेम और मानवता का व्यावहारिक ज्ञान है।
कबीर कहते हैं कि अपनी निंदा करने वाले को अपने पास ही रखना चाहिए, चाहे आँगन में उसके लिए झोपड़ी ही क्यों न बनवानी पड़े। क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के ही हमारे स्वभाव और आचरण को निर्मल कर देता है। आलोचक हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधरने का अवसर देता है।
कबीर कहते हैं कि किसी साधु या सज्जन की जाति मत पूछो, बल्कि उसके ज्ञान और गुणों को परखो। जैसे तलवार का मोल उसकी धार से होता है, म्यान (खोल) से नहीं। यह दोहा जाति-पाँति के भेदभाव को नकारकर व्यक्ति के गुणों को महत्व देने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जब गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों एक साथ खड़े हों तो पहले किसके चरण छुऊँ? मैं अपने गुरु पर बलिहारी जाता हूँ जिन्होंने मुझे गोविंद तक पहुँचने का मार्ग बताया। इस दोहे में गुरु की महिमा को ईश्वर से भी ऊँचा माना गया है।
कबीर कहते हैं कि हे मनुष्य! तू इस संसार में किस उद्देश्य से आया था, और चादर तानकर अज्ञानता की नींद में सो रहा है। हे लापरवाह! अब सचेत हो जा और अपने सच्चे स्वरूप (आत्मा) को पहचान। यह दोहा आत्मज्ञान और जीवन के उद्देश्य की ओर जगाता है।
कबीर कहते हैं कि जब उनका मन गंगा के जल की भाँति निर्मल और पवित्र हो गया, तो स्वयं ईश्वर 'कबीर-कबीर' पुकारते हुए उनके पीछे-पीछे चलने लगे। तात्पर्य यह है कि मन की पवित्रता से ही ईश्वर स्वयं भक्त की ओर खिंचे चले आते हैं।
कबीर कहते हैं कि अधिकांश लोग केवल शरीर से योगी बनते हैं (बाहरी वेश धारण करते हैं), परंतु मन को कोई योगी नहीं बनाता। यदि मन ही योगी बन जाए तो सभी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। यह दोहा बाहरी आडंबर के बजाय मन की साधना पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि बाज़ार में पड़ा हीरा धूल से लिपटा रहता है और साधारण लोग उसका मोल नहीं पहचानते। परंतु जब जौहरी आता है तो वह उसकी असली कीमत पहचान लेता है। यह दोहा बताता है कि गुणी और ज्ञानी व्यक्ति की पहचान केवल पारखी ही कर पाता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य दूसरों के दोष देखकर हँसता हुआ चलता रहता है, परंतु अपने स्वयं के दोष उसे याद ही नहीं आते, जिनका न आदि है न अंत। यह दोहा हमें दूसरों की आलोचना छोड़कर अपने भीतर के अनगिनत अवगुणों को देखने की सीख देता है।
कबीर कहते हैं कि चंदन के पास उगने वाले वृक्ष भी उसकी सुगंध पा लेते हैं। परंतु जो जड़ी-बूटियाँ या लोग सत्संग का सान्निध्य नहीं अपनाते, वे गुणहीन ही रह जाते हैं। यह दोहा अच्छी संगति के प्रभाव को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि जहाँ दया होती है वहीं धर्म का वास है, और जहाँ लोभ है वहाँ पाप है। जहाँ क्रोध है वहाँ काल (मृत्यु) है और जहाँ क्षमा है वहाँ स्वयं ईश्वर का निवास है। यह दोहा सद्गुणों और दुर्गुणों का परिणाम स्पष्ट करता है।
कबीर कहते हैं कि यह शरीर विष की बेल के समान है, जबकि गुरु अमृत की खान हैं। यदि अपना सिर देकर भी सच्चा गुरु मिल जाए तो उसे सस्ता ही समझना चाहिए। यह दोहा गुरु की अनमोल महिमा को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि सारा संसार खा-पीकर और सोकर सुखी प्रतीत होता है। परंतु ईश्वर का दास कबीर दुखी है क्योंकि वह जागकर (संसार की नश्वरता और प्रभु-वियोग में) रोता है। यह दोहा सांसारिक सुख और आध्यात्मिक जागृति के अंतर को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि मैंने ज्ञान की अग्नि से अपने मोह-माया रूपी घर को जला दिया है और वही जलती मशाल हाथ में ले ली है। अब मैं उसी का घर (अहंकार और मोह) जलाने को तैयार हूँ जो मेरे साथ इस सत्य के मार्ग पर चलना चाहे। यह दोहा संपूर्ण समर्पण और मोह-त्याग की माँग करता है।
कबीर कहते हैं कि माया और छाया एक जैसी होती हैं, इस रहस्य को बिरला ही समझ पाता है। यह माया भागते हुए भक्त के पीछे-पीछे दौड़ती है, परंतु जो साहसपूर्वक इसका सामना करता है, उससे यह स्वयं दूर भाग जाती है। तात्पर्य यह कि माया से डरकर भागने के बजाय निर्भय होकर उसका सामना करना चाहिए।
कबीर कहते हैं कि तेरा ईश्वर तेरे ही भीतर है, जैसे फूल में सुगंध समाई रहती है। परंतु मनुष्य उसे बाहर ढूँढता फिरता है, ठीक उस कस्तूरी मृग की तरह जो अपनी ही नाभि की सुगंध को वन में उदास होकर खोजता रहता है। यह दोहा आत्मा में ही परमात्मा के वास का बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि साधु की संगति गंधी (इत्र बेचने वाले) के पास बैठने जैसी है। वह कुछ न भी दे, तब भी उसकी सुगंध तो साथ आ ही जाती है। यह दोहा सत्संग के अनिवार्य शुभ प्रभाव को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि जो भक्त राम-नाम के रस में भीग जाता है, उसका वह प्रेम-रस कभी सूखता नहीं। उस अनुभूति और भाव को शब्दों में दिखाया नहीं जा सकता; वह तो अकथनीय कहानी है। यह दोहा भक्ति-अनुभव की अवर्णनीय गहराई को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि यदि पत्थर पूजने से ईश्वर मिलते तो मैं तो पूरा पहाड़ ही पूज लेता। इससे तो चक्की का पत्थर भला है जो अनाज पीसकर संसार का पेट भरता है। यह दोहा बाहरी मूर्तिपूजा के आडंबर पर प्रश्न उठाकर सच्ची भक्ति की ओर संकेत करता है।
कबीर कहते हैं कि माला फेरते-फेरते युगों जैसा समय बीत गया, फिर भी मन का भटकाव दूर नहीं हुआ। इसलिए हाथ की माला छोड़कर मन के मनके (भटकाव) को सुधारो। यह दोहा बाहरी कर्मकांड की जगह मन की शुद्धि पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि मिट्टी तो एक ही है, पर उससे अनेक प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती हैं—घड़ा, सुराही, प्याला आदि अनेक नाम पा लेती हैं। इसी प्रकार सभी जीवों में एक ही परमात्मा का अंश है, भेद केवल नाम-रूप का है। यह दोहा ईश्वर की एकता और समानता का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि ज्ञान रूपी रत्न को सँभालकर रखो, क्योंकि यह संसार तो मिट्टी के समान नश्वर है। हाय! यह दुर्लभ मानव जन्म व्यर्थ ही बीता जा रहा है। यह दोहा अमूल्य मानव जीवन में ज्ञान-अर्जन का महत्व बताता है।
कबीर कहते हैं कि ऐसा कोई बिरला ही मिलता है जो सच्ची आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान कर दे। उस दृष्टि के मिलते ही सब कुछ (परमतत्त्व) प्राप्त हो जाता है, परंतु माया मनुष्य को भ्रमित कर सत्य से विमुख रखती है। यह दोहा सद्गुरु की दृष्टि के महत्व को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहरें मोती तट पर ले आती हैं, परंतु बगुला उन्हें परखना नहीं जानता, जबकि हंस केवल श्रेष्ठ (मोती) ही चुनता है। यह दोहा बताता है कि विवेकी व्यक्ति ही सार-असार का भेद पहचानकर श्रेष्ठ को ग्रहण करता है।
कबीर कहते हैं कि कहते-सुनते सारे दिन बीत गए, फिर भी मनुष्य न तो सांसारिक उलझनों में पूरी तरह उलझा और न ही उनसे सुलझ पाया। हे मनुष्य! अब सचेत हो जा, आखिर कब तक यूँ ही भटकता रहेगा? यह दोहा आत्मचिंतन और जागृति की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि शील (सच्चरित्रता) सबसे बड़ा गुण है और यह सभी रत्नों की खान है। तीनों लोकों की समस्त संपदा सद्चरित्र में ही समाई हुई है। यह दोहा चरित्र को सबसे बड़ा धन बताता है।
कबीर कहते हैं कि वाणी अनमोल है, परंतु इसका मूल्य वही जानता है जो सोच-समझकर बोलता है। शब्दों को पहले हृदय रूपी तराजू में तौल लेना चाहिए, तभी उन्हें मुख से बाहर निकालना चाहिए। यह दोहा सोच-समझकर मधुर बोलने की शिक्षा देता है।
कबीर कहते हैं कि हे बंदे! तू मुझे कहाँ ढूँढता है, मैं तो तेरे ही पास (भीतर) हूँ। मैं न मंदिर में हूँ, न मस्जिद में, न काबा में और न कैलास में। यह दोहा ईश्वर को बाहरी स्थानों में नहीं, बल्कि अपने भीतर खोजने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि मैं न तो पूजा में हूँ, न नमाज़ में और न किसी अन्य धार्मिक कर्मकांड में। न मैं किसी दिशा-विशेष में हूँ, न लाहौर में और न हिंदू तीर्थस्थलों में। यह दोहा बताता है कि ईश्वर बाहरी आडंबरों में नहीं, सच्चे हृदय में बसता है।
कबीर कहते हैं कि यदि तू सच्चा खोजी है तो मैं तुझे पल भर की खोज में ही तुरंत मिल जाऊँगा। हे साधु भाइयो! सुनो—मैं तो श्रद्धा और विश्वास में ही निवास करता हूँ। यह दोहा सच्ची लगन और विश्वास से ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बताता है।
कबीर कहते हैं कि ऊँचे कुल में जन्म लेने मात्र से कोई श्रेष्ठ नहीं हो जाता, यदि उसके कर्म ऊँचे न हों। जैसे सोने के कलश में भरी मदिरा की संत निंदा ही करते हैं। यह दोहा कुल से अधिक कर्म को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि अपने बुरे कर्मों के कारण ही हंस रूपी आत्मा बंधनों में जकड़ जाती है। यदि मनुष्य अपने वास्तविक धर्म और कर्तव्य पर विचार करे तो वह क्यों बंधन में पड़े? यह दोहा कर्म और सच्चे धर्म-विवेक पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि साधु की जाति मत पूछो, बल्कि अपने कर्मों को देखो। राम-नाम के स्मरण रूपी कर्म ही संसार-सागर से पार उतारने वाली नौका है। यह दोहा जाति-भेद से ऊपर उठकर सत्कर्म और भक्ति को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि जीवित अवस्था में मुझे ऐसा कोई नहीं मिला जिसके सान्निध्य से मैं स्वयं को बड़ा अनुभव करूँ। हे साधु भाइयो! सुनो—जो सच्चे रूप में (परमतत्त्व को) देख लेता है, वही श्रेष्ठ है। यह दोहा सच्चे आत्मदर्शन को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि जैसे तिल में तेल और चकमक पत्थर में अग्नि छिपी रहती है, वैसे ही तेरा ईश्वर तेरे ही भीतर विद्यमान है। यदि जाग सको तो जाग जाओ (आत्मबोध प्राप्त करो)। यह दोहा अंतर्मुखी होकर ईश्वर को भीतर पहचानने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि खजूर के पेड़ की तरह केवल बड़ा (ऊँचा) हो जाने से क्या लाभ, जो न तो राहगीर को छाया देता है और जिसके फल भी इतने ऊँचे लगते हैं कि सहज नहीं मिलते। यह दोहा बताता है कि बड़प्पन तभी सार्थक है जब वह दूसरों के काम आए।
कबीर कहते हैं कि प्रेम का बगुला उठा और एक तिनके को आकाश तक ले गया; अंततः तिनका तिनके से जा मिला और अपने मूल स्वभाव से अलग नहीं हुआ। यह दोहा इस सत्य की ओर संकेत करता है कि आत्मा अंततः अपने उद्गम (परमात्मा) में ही जा मिलती है।
कबीर कहते हैं कि जिसका मन मैला हो पर शरीर (बाहरी रूप) उजला हो, वह बगुले के समान कपटी है। ऐसे पाखंडी से तो कौआ भला है जिसका तन और मन एक ही रंग का (निष्कपट) है। यह दोहा बाहरी दिखावे से अधिक भीतरी सच्चाई को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि जब तक मुझमें अहंकार ('मैं') था, तब तक ईश्वर के दर्शन न हुए; और अब जब ईश्वर प्रकट हुए तो 'मैं' मिट गया। जैसे ही भीतर ज्ञान का दीपक दिखाई दिया, अज्ञान का सारा अंधकार दूर हो गया। यह दोहा अहंकार के नाश से आत्मज्ञान की प्राप्ति बताता है।
कबीर कहते हैं कि केवल पढ़-पढ़कर मनुष्य पत्थर जैसा कठोर और लिख-लिखकर ईंट जैसा जड़ हो गया। हे मनुष्य! ऐसी विद्या पढ़ने से क्या लाभ, यदि तेरे मन में मिठास (कोमलता और प्रेम) न आई? यह दोहा शुष्क पुस्तकीय ज्ञान के बजाय हृदय की कोमलता पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि जीवन रूपी नाव भवसागर के बीच फँसी है; गुरु के बिना इसे पार कौन लगाएगा? हे साधु भाइयो! सुनो—गुरु के बिना मन को शांति और सहारा नहीं मिलता। यह दोहा भवसागर पार करने में गुरु की अनिवार्यता बताता है।
कबीर कहते हैं कि जब तू जन्म लेकर संसार में आया तो सब हँसे और तू रोया। अब जीवन में ऐसे सत्कर्म कर कि जब तू संसार से विदा हो तो तू (संतोष से) मुस्कुराए और संसार तेरे वियोग में रोए। यह दोहा सार्थक और सत्कर्मों से भरा जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि सच्चा संत अपनी संतता नहीं छोड़ता, चाहे करोड़ों दुर्जन उसे मिल जाएँ। जैसे चंदन काटे जाने पर भी अपनी शीतलता और सुगंध नहीं छोड़ता। यह दोहा सज्जन की दृढ़ सद्प्रकृति को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि जब गुणों का सच्चा पारखी (ग्राहक) मिल जाए तो गुण लाखों में बिकते हैं, अर्थात उनका पूरा सम्मान होता है। परंतु जब गुणों का कोई कद्रदान न हो तो वही गुण कौड़ी के मोल चले जाते हैं। यह दोहा बताता है कि गुणों का मूल्य उन्हें पहचानने वाले पर निर्भर करता है।
कबीर कहते हैं कि वृक्ष कभी अपना फल स्वयं नहीं खाता और नदी अपना जल स्वयं नहीं पीती। इसी प्रकार सच्चा संत भी केवल दूसरों के कल्याण के लिए जीता है। यह दोहा परोपकार और निःस्वार्थ सेवा का आदर्श प्रस्तुत करता है।
कबीर कहते हैं कि कस्तूरी मृग की अपनी नाभि में बसती है, फिर भी वह उसे वन में ढूँढता फिरता है। ठीक इसी प्रकार राम (ईश्वर) हर हृदय में विद्यमान हैं, परंतु संसार उन्हें अपने भीतर देख नहीं पाता। यह दोहा आत्मा में ही परमात्मा के वास का बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि यदि उस एक परमतत्त्व को नहीं जाना तो बहुत कुछ जान लेने से क्या लाभ? जो उस एक को जान लेता है वह सब कुछ जान लेता है, और जो अनेक (बाहरी ज्ञान) में उलझा रहता है वह सब कुछ खो देता है। यह दोहा एकमात्र ब्रह्म-ज्ञान को सर्वोपरि बताता है।
कबीर कहते हैं कि सोना, सज्जन और साधु-जन सौ बार टूटकर भी फिर जुड़ जाते हैं। परंतु दुर्जन कुम्हार के घड़े के समान होता है जो एक ही चोट में फूट जाता है (और फिर नहीं जुड़ता)। यह दोहा सज्जन और दुर्जन के स्वभाव का अंतर स्पष्ट करता है।
कबीर कहते हैं कि साधु तो अतिथि बनकर (ज्ञान बाँटने) आया, परंतु मूर्ख मनुष्य उल्टा उसे ही उपदेश देने लगा—यह विपरीत बुद्धि उसकी समझ में नहीं आई। यह दोहा अहंकारवश ज्ञानी का मूल्य न पहचानने वाले की मूर्खता पर व्यंग्य करता है।
कबीर कहते हैं कि गुरु के बिना तू कितना भी खोज ले, सच्चा उत्तर (आत्मज्ञान) नहीं मिलता। हे साधु भाइयो! सुनो—सच्चा गुरु तो कोई बिरला ही होता है। यह दोहा सद्गुरु की दुर्लभता और आवश्यकता दोनों को रेखांकित करता है।
कबीर कहते हैं कि संतों के सान्निध्य से संसार में ज्ञान का उजाला फैलता है और उनके चले जाने पर अज्ञान का अंधकार छा जाता है। जिस घर में साधु-संतों का आदर नहीं होता, उस घर पर हज़ार धिक्कार है। यह दोहा संत-सान्निध्य और उनके सम्मान का महत्व बताता है।
कबीर कहते हैं कि शरीर धारण करने का यही दंड है कि मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है—कर्म के इस नियम (धर्म) से कोई नहीं बच सकता। यह दोहा कर्म-फल के अटल सिद्धांत को स्पष्ट करता है।
कबीर कहते हैं कि बार-बार नहाने-धोने से क्या लाभ, यदि मन का मैल (विकार) न धुले? जैसे मछली सदा जल में रहती है, फिर भी उसकी गंध नहीं जाती। यह दोहा बाहरी शुद्धि से अधिक मन की आंतरिक शुद्धि पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य ने रातें सोने में और दिन खाने-पीने में गँवा दिए। यह मानव जन्म तो हीरे के समान अनमोल था, पर वह उसे कौड़ी के मोल व्यर्थ गँवा रहा है। यह दोहा दुर्लभ मानव जीवन को व्यर्थ न करने की चेतावनी देता है।
कबीर कहते हैं कि तू केवल पुस्तकों में लिखी बातों के आधार पर बोलता है, जबकि मैं अपनी आँखों से देखे (स्वयं अनुभव किए) सत्य की बात करता हूँ। मैं तो उलझन सुलझाने वाली बात कहता हूँ, पर तू उसे और उलझाए रखता है। यह दोहा पुस्तकीय ज्ञान पर आत्मानुभव की श्रेष्ठता बताता है।
कबीर कहते हैं कि यदि समूची धरती को कागज़, समस्त वनों को कलम और सातों समुद्रों को स्याही बना लूँ, तब भी गुरु के गुणों (महिमा) को लिखकर पूरा नहीं किया जा सकता। यह दोहा गुरु की अपार और अवर्णनीय महिमा को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि न कहीं सच्चा गुरु मिला और न सच्चा शिष्य; दोनों ही (योग्य) पक्ष दूर हो गए। ऐसे में कबीर के मन में जो गूढ़ अनुभूति है, उसे अब किसे बताएँ? यह दोहा सच्चे ज्ञान के पात्रों की दुर्लभता पर खेद व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि कच्चा फल हरा (अपरिपक्व) ही रहता है और बहुत से जीव बिना परिपक्व (आत्मज्ञान को प्राप्त) हुए ही मर जाते हैं। परंतु सच्चा साधु ऐसा होता है जो लाखों लोगों को (भवसागर से) तार देता है। यह दोहा सच्चे संत की उद्धारक शक्ति को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि पानी ऊँचाई पर नहीं ठहरता, वह नीचे (निचले स्थान) पर ही टिकता है। इसी प्रकार जहाँ नम्रता होती है, वही नीचा (विनम्र) व्यक्ति वास्तव में सबसे ऊँचा होता है। यह दोहा विनम्रता को सच्ची श्रेष्ठता बताता है।
कबीर कहते हैं कि जब तक मन में काम, क्रोध, मद (अहंकार) और लोभ की खान (भंडार) भरी है, तब तक साधना सिद्ध नहीं होती। वे संतों को सावधान करते हैं कि इन विकारों से सदा सतर्क रहो। यह दोहा मन के प्रमुख विकारों से बचने की चेतावनी देता है।
कबीर कहते हैं कि ज्ञान के बिना सारा संसार भटकता रहता है, इसलिए हे मन! तू रात-दिन सचेत रह। हे साधु भाइयो! सुनो—हरि-नाम के स्मरण से ही सौभाग्य (कल्याण) प्राप्त होता है। यह दोहा ज्ञान और हरि-नाम को जीवन का आधार बताता है।
कबीर कहते हैं कि ऊँचे कुल में जन्म लेने मात्र से कोई श्रेष्ठ नहीं हो जाता, यदि उसके कर्म ऊँचे न हों। जैसे बाँस ऊँचा तो होता है, परंतु उसमें (चंदन जैसी) सुगंध कहाँ होती है? यह दोहा कुल से अधिक सत्कर्म को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि सुंदर शरीर पाकर भी यदि मनुष्य सुंदर (अच्छे) कर्म न करे, तो वह शरीर किस काम का जिसमें राम (ईश्वर का स्मरण) ही न हो? यह दोहा शरीर की सार्थकता सत्कर्म और प्रभु-स्मरण में बताता है।
कबीर कहते हैं कि बकरी तो केवल पत्ते खाती है, फिर भी उसकी खाल खींची जाती है। फिर जो मनुष्य ऊपर से तो राम-राम कहता है पर भीतर कुटिलता और कठोरता से भरा है, उसकी क्या दशा होगी? यह दोहा बाहरी दिखावे और भीतरी कपट के अंतर पर चेतावनी देता है।
कबीर प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! संसार को भले ही सांसारिक भोग-वस्तुएँ दें, परंतु मुझे तो ब्रह्म-ज्ञान दें। लोग संसार के धोखे (मोह) में ही पड़े रहते हैं और इसी में सारा जीवन-संसार बीत जाता है। यह दोहा सांसारिक मोह से ऊपर ब्रह्म-ज्ञान की कामना व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि हिंदू और मुसलमान दोनों को एक ही करता (ईश्वर) ने रचा है। भले ही दोनों अलग-अलग राहों पर चलते हों, पर अंततः उनका घर और द्वार (परमात्मा) एक ही है। यह दोहा धार्मिक एकता और ईश्वर के एकत्व का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि राम और रहीम एक ही हैं, बस उन्हें दो अलग नाम दे दिए गए हैं। जो इस सत्य को समझ लेता है, वही सच्चा साधु है। यह दोहा ईश्वर के एकत्व और साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि शरीर की साधना से बढ़कर मन की साधना है—असली बात तब है जब मन ही योगी (साधक) बन जाए। जो इस मन की साधना को प्राप्त कर लेता है, वही सच्चा साधु होता है। यह दोहा बाहरी योग की जगह मन की साधना पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि सच्चा ज्ञानी निर्भय हो जाता है, जबकि अभिमानी केवल हठयोग (बाहरी क्रियाओं) में उलझा रहता है। पर वे कहते हैं कि हरि के भजन के बिना संसार रूपी रोग (जन्म-मरण का चक्र) नहीं मिटता। यह दोहा हठयोग के अभिमान से ऊपर हरि-भजन को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि हृदय के मर्म (सच्चे भाव) को जाने बिना मनुष्य चाहे जितना भी नाम-जप कर ले, वह व्यर्थ है। हे भाई! सुनो—भीतरी सच्चाई और भाव के बिना कोई भी साधना सफल नहीं होती। यह दोहा बाहरी जप से अधिक हृदय के सच्चे भाव को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि सत्य के समान कोई तप नहीं और झूठ के समान कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सत्य का वास है, उसी के हृदय में स्वयं ईश्वर निवास करते हैं। यह दोहा सत्य को सर्वोच्च तप और ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बताता है।
कबीर कहते हैं कि जहाँ काम (विषय-वासना) है वहाँ ईश्वर का नाम नहीं ठहरता, और जहाँ नाम है वहाँ काम नहीं रहता। यदि कोई इन दोनों को एक साथ रखने का दावा करे तो वह अज्ञान का घर है। यह दोहा वासना और भक्ति के परस्पर विरोध को स्पष्ट करता है।
कबीर कहते हैं कि सोच-विचारकर बोलना चाहिए और समझकर ही कोई बात लिखनी चाहिए। यदि मनुष्य अपने मन को संयम में रखे तो मन को सच्चा आनंद प्राप्त होता है। यह दोहा संयमित वाणी और मन के नियंत्रण का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि पाप से पाप नहीं कटता और एक पाप से दूसरा पाप नहीं मिटता। पापों का संताप तो केवल राम-नाम के जप से ही दूर होता है। यह दोहा प्रायश्चित और पाप-मुक्ति के लिए हरि-नाम को एकमात्र उपाय बताता है।
कबीर कहते हैं कि हे भाई! देखो, ज्ञान की लहर आई है—अब ज्ञान और विवेक का चिंतन जाग्रत करो। हे साधु भाइयो! सुनो—सच्चे ज्ञान से ही जीव का उद्धार (मुक्ति) होता है। यह दोहा आत्मज्ञान को मुक्ति का साधन बताता है।