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67 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
संत कबीर दास के जीवन पर आधारित दोहे हमें जीवन जीने की सच्ची कला सिखाते हैं। इन दोहों में सरल भाषा में जीवन के गहरे सत्य, कर्म, संयम और सार्थक जीवन का संदेश छिपा है। नीचे जीवन से जुड़े प्रसिद्ध कबीर दोहे हिंदी अर्थ सहित दिए गए हैं।
कबीर कहते हैं कि जब मैं संसार में बुराई ढूँढने निकला तो मुझे कोई बुरा नहीं मिला। परंतु जब मैंने अपने ही मन के भीतर झाँककर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं। तात्पर्य यह है कि दूसरों के दोष देखने के बजाय हमें पहले अपने भीतर के अवगुणों को पहचानकर उन्हें सुधारना चाहिए।
कबीर समझाते हैं कि हे मन! धैर्य रखो, संसार में हर काम अपने उचित समय पर ही होता है। जैसे माली चाहे सौ घड़े पानी से पेड़ को सींच ले, फल तो ऋतु आने पर ही लगते हैं। इसलिए जल्दबाज़ी छोड़कर धैर्य और निरंतर प्रयास में विश्वास रखना चाहिए।
कबीर कहते हैं कि कल का काम आज कर लो और आज का काम अभी कर लो, क्योंकि पल भर में प्रलय (मृत्यु या विनाश) आ सकती है। यदि समय रहते काम न किया तो फिर कब करोगे? यह दोहा हमें आलस्य त्यागकर समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि दुख आने पर तो सभी ईश्वर को याद करते हैं, परंतु सुख में कोई उसका स्मरण नहीं करता। यदि मनुष्य सुख के समय भी ईश्वर को याद रखे तो उसके जीवन में दुख आएगा ही क्यों? यह दोहा हर परिस्थिति में प्रभु-स्मरण का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि अपनी निंदा करने वाले को अपने पास ही रखना चाहिए, चाहे आँगन में उसके लिए झोपड़ी ही क्यों न बनवानी पड़े। क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के ही हमारे स्वभाव और आचरण को निर्मल कर देता है। आलोचक हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधरने का अवसर देता है।
कबीर कहते हैं कि किसी भी बात की अति अच्छी नहीं होती। न तो बहुत अधिक बोलना अच्छा है और न ही बहुत अधिक चुप रहना; न अधिक वर्षा अच्छी है और न अधिक धूप। यह दोहा जीवन में संतुलन और मध्यम मार्ग अपनाने की शिक्षा देता है।
कबीर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! मुझे केवल इतना ही दीजिए जिससे मेरे परिवार का भरण-पोषण हो जाए। न तो मैं स्वयं भूखा रहूँ और न ही मेरे द्वार आया कोई साधु भूखा लौटे। यह दोहा संतोष और सीमित आवश्यकताओं में संतुष्ट रहने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य को ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिसमें अहंकार न हो। ऐसी वाणी दूसरों को तो शीतलता और सुख देती ही है, साथ ही बोलने वाले के मन को भी शांति प्रदान करती है। यह दोहा मधुर और विनम्र वाणी का महत्व बताता है।
कबीर कहते हैं कि मन के हार मान लेने में ही हार है और मन के जीतने में ही जीत है। परब्रह्म (ईश्वर) की प्राप्ति भी मन के विश्वास और दृढ़ता से ही होती है। यह दोहा आत्मविश्वास और मन की शक्ति के महत्व को रेखांकित करता है।
कबीर कहते हैं कि वे संसार रूपी बाज़ार में खड़े होकर सभी के कल्याण की कामना करते हैं। उनका न तो किसी से विशेष मित्रता का स्वार्थ है और न किसी से बैर। यह दोहा निष्पक्षता, समभाव और सबके प्रति सद्भावना का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जो उदय हुआ है वह अस्त होगा, जो खिला है वह मुरझाएगा, जो बना है वह ढह जाएगा और जो इस संसार में आया है वह एक दिन अवश्य जाएगा। यह दोहा संसार की नश्वरता और अनित्यता का गहरा सत्य प्रकट करता है।
कबीर कहते हैं कि हे मनुष्य! तू इस संसार में किस उद्देश्य से आया था, और चादर तानकर अज्ञानता की नींद में सो रहा है। हे लापरवाह! अब सचेत हो जा और अपने सच्चे स्वरूप (आत्मा) को पहचान। यह दोहा आत्मज्ञान और जीवन के उद्देश्य की ओर जगाता है।
कबीर कहते हैं कि बाज़ार में पड़ा हीरा धूल से लिपटा रहता है और साधारण लोग उसका मोल नहीं पहचानते। परंतु जब जौहरी आता है तो वह उसकी असली कीमत पहचान लेता है। यह दोहा बताता है कि गुणी और ज्ञानी व्यक्ति की पहचान केवल पारखी ही कर पाता है।
कबीर कहते हैं कि संत यही उपदेश देते हैं कि संतोष रखो और जो रूखा-सूखा मिल जाए उसी में संतुष्ट रहो। जो श्रेष्ठ कर्म (खेती) करता है, वह सबके साथ मिल-बाँटकर खाता है। यह दोहा संतोष और परोपकार के भाव का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य दूसरों के दोष देखकर हँसता हुआ चलता रहता है, परंतु अपने स्वयं के दोष उसे याद ही नहीं आते, जिनका न आदि है न अंत। यह दोहा हमें दूसरों की आलोचना छोड़कर अपने भीतर के अनगिनत अवगुणों को देखने की सीख देता है।
कबीर कहते हैं कि चंदन के पास उगने वाले वृक्ष भी उसकी सुगंध पा लेते हैं। परंतु जो जड़ी-बूटियाँ या लोग सत्संग का सान्निध्य नहीं अपनाते, वे गुणहीन ही रह जाते हैं। यह दोहा अच्छी संगति के प्रभाव को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि जहाँ दया होती है वहीं धर्म का वास है, और जहाँ लोभ है वहाँ पाप है। जहाँ क्रोध है वहाँ काल (मृत्यु) है और जहाँ क्षमा है वहाँ स्वयं ईश्वर का निवास है। यह दोहा सद्गुणों और दुर्गुणों का परिणाम स्पष्ट करता है।
कबीर कहते हैं कि जिसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करता है, उसे कोई मार नहीं सकता। चाहे सारा संसार उसका शत्रु बन जाए, तब भी कोई उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकता। यह दोहा ईश्वर पर अटूट विश्वास और शरणागति का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जो व्यक्ति तुम्हारे मार्ग में काँटे बोए, तुम उसके लिए फूल बोना। ऐसा करने से तुम्हें तो फूल ही फूल मिलेंगे, परंतु उसके हिस्से त्रिशूल समान कष्ट आएँगे। यह दोहा बुराई के बदले भलाई करने की उदात्त शिक्षा देता है।
कबीर कहते हैं कि सारा संसार खा-पीकर और सोकर सुखी प्रतीत होता है। परंतु ईश्वर का दास कबीर दुखी है क्योंकि वह जागकर (संसार की नश्वरता और प्रभु-वियोग में) रोता है। यह दोहा सांसारिक सुख और आध्यात्मिक जागृति के अंतर को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब कोई किसी का नहीं रहेगा। मृत्यु के समय घर के लोग शरीर रूपी संगिनी (आत्मा) से कह देंगे कि अब यहाँ से चली जाओ। यह दोहा सांसारिक संबंधों की नश्वरता का स्मरण कराता है।
कबीर कहते हैं कि रखवाले के बिना चिड़ियों ने खेत चुग लिया; अब आधा-अधूरा ही बचा है। हे मनुष्य! जितना अभी बचा है, उसी में सचेत होकर सँभल जा। यह दोहा जीवन रूपी अवसर के नष्ट होने से पहले सजग होने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है। जैसे प्रातःकाल होते ही तारा छिप जाता है, वैसे ही यह शरीर भी एक दिन समाप्त हो जाएगा। यह दोहा जीवन की नश्वरता का गहरा बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि अच्छी संगति से सुख मिलता है और बुरी संगति से दुख। इसलिए यदि अपना कल्याण चाहते हो तो सदैव साधु-संतों की संगति करो। यह दोहा जीवन में संगति के महत्व को रेखांकित करता है।
कबीर कहते हैं कि साधु की संगति गंधी (इत्र बेचने वाले) के पास बैठने जैसी है। वह कुछ न भी दे, तब भी उसकी सुगंध तो साथ आ ही जाती है। यह दोहा सत्संग के अनिवार्य शुभ प्रभाव को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि शरीर पक्षी के समान हो गया है—मन जहाँ जाता है, वह वहीं उड़ जाता है। मनुष्य जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। यह दोहा मन की चंचलता और संगति के परिणाम दोनों पर प्रकाश डालता है।
कबीर कहते हैं कि जिस हृदय में प्रेम का संचार नहीं होता, उसे निष्प्राण ही समझो। वह लोहार की धौंकनी के समान है जो साँस तो लेती है, परंतु जिसमें जीवन नहीं होता। यह दोहा प्रेमरहित जीवन को निरर्थक बताता है।
कबीर कहते हैं कि जैसे प्राण के बिना देह व्यर्थ है, वैसे ही राम (ईश्वर) के बिना यह शरीर निरर्थक है। जब मन का मोह छूट जाता है तो जीव संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है। यह दोहा ईश्वर-स्मरण को जीवन का सार बताता है।
कबीर कहते हैं कि ज्ञान रूपी रत्न को सँभालकर रखो, क्योंकि यह संसार तो मिट्टी के समान नश्वर है। हाय! यह दुर्लभ मानव जन्म व्यर्थ ही बीता जा रहा है। यह दोहा अमूल्य मानव जीवन में ज्ञान-अर्जन का महत्व बताता है।
कबीर कहते हैं कि कहते-सुनते सारे दिन बीत गए, फिर भी मनुष्य न तो सांसारिक उलझनों में पूरी तरह उलझा और न ही उनसे सुलझ पाया। हे मनुष्य! अब सचेत हो जा, आखिर कब तक यूँ ही भटकता रहेगा? यह दोहा आत्मचिंतन और जागृति की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि शील (सच्चरित्रता) सबसे बड़ा गुण है और यह सभी रत्नों की खान है। तीनों लोकों की समस्त संपदा सद्चरित्र में ही समाई हुई है। यह दोहा चरित्र को सबसे बड़ा धन बताता है।
कबीर कहते हैं कि ऊँचे कुल में जन्म लेने मात्र से कोई श्रेष्ठ नहीं हो जाता, यदि उसके कर्म ऊँचे न हों। जैसे सोने के कलश में भरी मदिरा की संत निंदा ही करते हैं। यह दोहा कुल से अधिक कर्म को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि अपने बुरे कर्मों के कारण ही हंस रूपी आत्मा बंधनों में जकड़ जाती है। यदि मनुष्य अपने वास्तविक धर्म और कर्तव्य पर विचार करे तो वह क्यों बंधन में पड़े? यह दोहा कर्म और सच्चे धर्म-विवेक पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि अपनी गली में तो कुत्ता भी शेर बनकर अकड़ता है, परंतु परदेस में जाने पर वही पूँछ दबाकर चलता है। यह दोहा बताता है कि अपने क्षेत्र का बल और अहंकार स्थायी नहीं होता—विनम्रता ही श्रेष्ठ है।
कबीर कहते हैं कि खजूर के पेड़ की तरह केवल बड़ा (ऊँचा) हो जाने से क्या लाभ, जो न तो राहगीर को छाया देता है और जिसके फल भी इतने ऊँचे लगते हैं कि सहज नहीं मिलते। यह दोहा बताता है कि बड़प्पन तभी सार्थक है जब वह दूसरों के काम आए।
कबीर कहते हैं कि ईश्वर को पाने के लिए जंगल में भटकने की आवश्यकता नहीं; घर में रहते हुए ही विरक्त भाव (अनासक्ति) रखो। जो भी प्रभु मिलना है, वह यहीं गृहस्थ जीवन में रहकर मिल जाएगा। यह दोहा सांसारिक जीवन में रहते हुए भी भक्ति-साधना संभव होने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जिसका मन मैला हो पर शरीर (बाहरी रूप) उजला हो, वह बगुले के समान कपटी है। ऐसे पाखंडी से तो कौआ भला है जिसका तन और मन एक ही रंग का (निष्कपट) है। यह दोहा बाहरी दिखावे से अधिक भीतरी सच्चाई को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि भूख कुतिया के समान है जो भजन-साधना में बार-बार विघ्न डालती है। इसलिए इसे थोड़ा-सा भोजन रूपी टुकड़ा डालकर शांत कर दो और फिर निश्चिंत होकर प्रभु-स्मरण करो। यह दोहा बताता है कि शरीर की मूल आवश्यकताएँ पूरी कर मन को साधना में लगाना चाहिए।
कबीर कहते हैं कि जब तू जन्म लेकर संसार में आया तो सब हँसे और तू रोया। अब जीवन में ऐसे सत्कर्म कर कि जब तू संसार से विदा हो तो तू (संतोष से) मुस्कुराए और संसार तेरे वियोग में रोए। यह दोहा सार्थक और सत्कर्मों से भरा जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि सच्चा संत अपनी संतता नहीं छोड़ता, चाहे करोड़ों दुर्जन उसे मिल जाएँ। जैसे चंदन काटे जाने पर भी अपनी शीतलता और सुगंध नहीं छोड़ता। यह दोहा सज्जन की दृढ़ सद्प्रकृति को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि जब गुणों का सच्चा पारखी (ग्राहक) मिल जाए तो गुण लाखों में बिकते हैं, अर्थात उनका पूरा सम्मान होता है। परंतु जब गुणों का कोई कद्रदान न हो तो वही गुण कौड़ी के मोल चले जाते हैं। यह दोहा बताता है कि गुणों का मूल्य उन्हें पहचानने वाले पर निर्भर करता है।
कबीर कहते हैं कि वृक्ष कभी अपना फल स्वयं नहीं खाता और नदी अपना जल स्वयं नहीं पीती। इसी प्रकार सच्चा संत भी केवल दूसरों के कल्याण के लिए जीता है। यह दोहा परोपकार और निःस्वार्थ सेवा का आदर्श प्रस्तुत करता है।
कबीर कहते हैं कि भक्ति चौगान (पोलो) के खेल की गेंद के समान है, जिसे जो चाहे प्रेम से अपना ले। सच्चे खिलाड़ी (भक्त) तो हर हाल में प्रसन्न रहते हैं—चाहे जीतें या हार जाएँ। यह दोहा निष्काम और आनंदमय भक्ति का भाव दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि यदि मन शांत और शीतल हो जाए तो संसार में कोई शत्रु नहीं रहता। अपने अहंकार को त्याग दो, फिर सभी तुम पर दया और स्नेह करेंगे। यह दोहा मन की शांति और अहंकार-त्याग का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि चलती हुई चक्की को देखकर वे रो पड़े, क्योंकि उसके दो पाटों के बीच कोई दाना साबुत नहीं बचता। इसी प्रकार संसार रूपी चक्की (काल और माया) के बीच कोई जीव नहीं बचता। (संत यह भी कहते हैं कि जो कील रूपी सच्चे आश्रय—प्रभु—से चिपका रहे, वही बचता है।) यह दोहा संसार की नश्वरता का गहन बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि सोना, सज्जन और साधु-जन सौ बार टूटकर भी फिर जुड़ जाते हैं। परंतु दुर्जन कुम्हार के घड़े के समान होता है जो एक ही चोट में फूट जाता है (और फिर नहीं जुड़ता)। यह दोहा सज्जन और दुर्जन के स्वभाव का अंतर स्पष्ट करता है।
कबीर कहते हैं कि जब राम ने (मृत्यु रूपी) बुलावा भेजा तो वे रो पड़े, क्योंकि साधु-संतों की संगति में जो सुख मिलता है वह तो बैकुंठ (स्वर्ग) में भी नहीं है। यह दोहा सत्संग के अनुपम आनंद को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ बताता है।
कबीर कहते हैं कि पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के मेल से यह शरीर बना है और इसी से आशा-तृष्णा उपजती है। जब यह शरीर अंततः मिट्टी में मिल जाएगा तो फिर इसके लिए रोना-धोना किस काम का? यह दोहा शरीर की नश्वरता और तृष्णा के मिथ्यापन को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि संतों के सान्निध्य से संसार में ज्ञान का उजाला फैलता है और उनके चले जाने पर अज्ञान का अंधकार छा जाता है। जिस घर में साधु-संतों का आदर नहीं होता, उस घर पर हज़ार धिक्कार है। यह दोहा संत-सान्निध्य और उनके सम्मान का महत्व बताता है।
कबीर कहते हैं कि शरीर धारण करने का यही दंड है कि मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है—कर्म के इस नियम (धर्म) से कोई नहीं बच सकता। यह दोहा कर्म-फल के अटल सिद्धांत को स्पष्ट करता है।
कबीर कहते हैं कि जिसने प्रेम (ईश्वर-प्रेम) का स्वाद नहीं चखा और उसके सार को नहीं पहचाना, उसका जीवन सूने घर के अतिथि जैसा है जो जैसे आया वैसे ही खाली लौट जाता है। यह दोहा प्रेम और भक्ति के बिना जीवन को निरर्थक बताता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य ने रातें सोने में और दिन खाने-पीने में गँवा दिए। यह मानव जन्म तो हीरे के समान अनमोल था, पर वह उसे कौड़ी के मोल व्यर्थ गँवा रहा है। यह दोहा दुर्लभ मानव जीवन को व्यर्थ न करने की चेतावनी देता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य झूठे (क्षणिक) सुख को ही सच्चा सुख मानकर मन में प्रसन्न होता है। पर सारा संसार तो काल का चबेना (नाश्ता) है—कुछ उसके मुँह में है और कुछ गोद में रखा है, अर्थात सब क्रमशः काल का ग्रास बनेगा। यह दोहा सांसारिक सुख की क्षणभंगुरता दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य जैसा भोजन करता है, उसका मन भी वैसा ही बन जाता है; और जैसा जल (संगति/परिवेश) ग्रहण करता है, उसकी वाणी भी वैसी ही हो जाती है। यह दोहा शुद्ध आहार और सात्विक परिवेश के मन व वाणी पर प्रभाव को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि जब तक संसार के मोह-संबंधों से लगाव बना रहता है, तब तक सच्ची भक्ति नहीं हो पाती। जो मोह के बंधन तोड़कर हरि का भजन करता है, वही सच्चा भक्त कहलाता है। यह दोहा भक्ति के लिए मोह-त्याग की आवश्यकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि पानी ऊँचाई पर नहीं ठहरता, वह नीचे (निचले स्थान) पर ही टिकता है। इसी प्रकार जहाँ नम्रता होती है, वही नीचा (विनम्र) व्यक्ति वास्तव में सबसे ऊँचा होता है। यह दोहा विनम्रता को सच्ची श्रेष्ठता बताता है।
कबीर कहते हैं कि (अनियंत्रित) आशा ईंधन की तरह जलती रहती है और चिंता उसे और दहकाती है। जो इन दोनों पर विवेक से नियंत्रण रखे, वही धर्म के मार्ग पर चलता है। यह दोहा अतृप्त आशा और चिंता से बचकर संयमित जीवन जीने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जैसे घास खाए बिना घोड़ा एक कदम भी नहीं चल पाता, वैसे ही भूखे पेट भजन-साधना भी नहीं हो पाती। इसलिए पहले रोटी खाकर शरीर की आवश्यकता पूरी करो, फिर निश्चिंत होकर प्रभु का भजन करो। यह दोहा संतुलित और व्यावहारिक साधना का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि सुंदर शरीर पाकर भी यदि मनुष्य सुंदर (अच्छे) कर्म न करे, तो वह शरीर किस काम का जिसमें राम (ईश्वर का स्मरण) ही न हो? यह दोहा शरीर की सार्थकता सत्कर्म और प्रभु-स्मरण में बताता है।
कबीर कहते हैं कि हे मनुष्य! जीवन के ये थोड़े-से दिन रूपी नौबत (बाजे) को बजा ले, अर्थात इस अल्प जीवन का सदुपयोग कर ले। यह नगर, यह बस्ती और यह गली—इन्हें फिर लौटकर देखने को नहीं मिलेंगे। यह दोहा जीवन की क्षणभंगुरता और समय के सदुपयोग की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि संसार में एक जीव दूसरे जीव को खाता है, परंतु सच्चा संत मांस नहीं खाता (किसी जीव की हिंसा नहीं करता)। हे जीव! तू अहिंसक होकर जी और राम के समीप रहकर अपने भाव को सींच। यह दोहा अहिंसा और प्रभु-सान्निध्य का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि इस संसार में जो व्यक्ति सच्चे संत की शरण ले लेता है, वह उन भक्तजनों के सहारे भवसागर के पार पहुँच जाता है। यह दोहा संत-शरण को मुक्ति का साधन बताता है।
कबीर कहते हैं कि सत्य के समान कोई तप नहीं और झूठ के समान कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सत्य का वास है, उसी के हृदय में स्वयं ईश्वर निवास करते हैं। यह दोहा सत्य को सर्वोच्च तप और ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बताता है।
कबीर कहते हैं कि बचपन हँसी-खेल में बीत गया और जवानी आलस्य व प्रमाद की नींद में चली गई। अब बुढ़ापे को आता देख मनुष्य खड़ा होकर पछताता है (कि भक्ति का समय गँवा दिया)। यह दोहा जीवन के हर चरण में समय के सदुपयोग की सीख देता है।
कबीर कहते हैं कि पल भर में प्रलय (मृत्यु) आ सकती है, फिर तू अपना काम कब करेगा? इसलिए कल का काम आज और आज का काम अभी कर ले। यह दोहा आलस्य त्यागकर तुरंत सत्कर्म और भक्ति में लग जाने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि जो कुछ तुम मुख से बोलते हो, उसे अपने मन में भी उतारो (आचरण में लाओ)। और जो सच्चा भाव मन में है, उसे प्रेमपूर्वक मुख से कहो। यह दोहा वाणी और आचरण में एकरूपता तथा निष्कपटता का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि इस संसार के सारे व्यवहार (सांसारिक लेन-देन और संबंध) झूठे एवं नश्वर हैं। जो व्यक्ति अपनी जीवन-नौका को राम-नाम के सहारे खेता है, वही भवसागर के पार उतरता है। यह दोहा सांसारिक मिथ्या से ऊपर हरि-नाम के आश्रय को महत्व देता है।