ॐ
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कबीर कहते हैं कि मैंने ज्ञान की अग्नि से अपने मोह-माया रूपी घर को जला दिया है और वही जलती मशाल हाथ में ले ली है। अब मैं उसी का घर (अहंकार और मोह) जलाने को तैयार हूँ जो मेरे साथ इस सत्य के मार्ग पर चलना चाहे। यह दोहा संपूर्ण समर्पण और मोह-त्याग की माँग करता है।