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82 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
कबीर दास के भक्ति पर दोहे सच्चे हृदय से ईश्वर-स्मरण और निष्काम भक्ति का संदेश देते हैं। ये दोहे बाहरी कर्मकांड से ऊपर हृदय की सच्ची भक्ति को महत्व देते हैं। नीचे भक्ति पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित पढ़ें।
कबीर कहते हैं कि बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ते-पढ़ते सारा संसार समाप्त हो गया, फिर भी कोई सच्चा ज्ञानी न बन सका। असली पंडित (ज्ञानी) वही है जो प्रेम के ढाई अक्षर को पढ़ और समझ ले। तात्पर्य यह है कि पुस्तकीय ज्ञान से बढ़कर प्रेम और मानवता का व्यावहारिक ज्ञान है।
कबीर कहते हैं कि दुख आने पर तो सभी ईश्वर को याद करते हैं, परंतु सुख में कोई उसका स्मरण नहीं करता। यदि मनुष्य सुख के समय भी ईश्वर को याद रखे तो उसके जीवन में दुख आएगा ही क्यों? यह दोहा हर परिस्थिति में प्रभु-स्मरण का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जब गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों एक साथ खड़े हों तो पहले किसके चरण छुऊँ? मैं अपने गुरु पर बलिहारी जाता हूँ जिन्होंने मुझे गोविंद तक पहुँचने का मार्ग बताया। इस दोहे में गुरु की महिमा को ईश्वर से भी ऊँचा माना गया है।
कबीर कहते हैं कि जब तक मुझमें 'मैं' अर्थात अहंकार था, तब तक ईश्वर नहीं मिले; और अब जब ईश्वर मिल गए तो 'मैं' नहीं रहा। प्रेम की गली बहुत सँकरी है, उसमें अहंकार और ईश्वर दोनों एक साथ नहीं समा सकते। ईश्वर-प्राप्ति के लिए अहंकार का त्याग आवश्यक है।
कबीर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! मुझे केवल इतना ही दीजिए जिससे मेरे परिवार का भरण-पोषण हो जाए। न तो मैं स्वयं भूखा रहूँ और न ही मेरे द्वार आया कोई साधु भूखा लौटे। यह दोहा संतोष और सीमित आवश्यकताओं में संतुष्ट रहने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि मन के हार मान लेने में ही हार है और मन के जीतने में ही जीत है। परब्रह्म (ईश्वर) की प्राप्ति भी मन के विश्वास और दृढ़ता से ही होती है। यह दोहा आत्मविश्वास और मन की शक्ति के महत्व को रेखांकित करता है।
कबीर कहते हैं कि यदि लूट सकते हो तो राम-नाम के सुमिरन रूपी धन को लूट लो, अर्थात भरपूर भक्ति कर लो। नहीं तो बाद में पछताओगे जब प्राण शरीर छोड़कर चले जाएँगे। यह दोहा जीवित रहते ही प्रभु-भक्ति में लीन होने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य को वही धन संचित करना चाहिए जो आगे (परलोक) में काम आए, अर्थात पुण्य और भक्ति का धन। सिर पर गठरी (सांसारिक धन) रखकर इस संसार से जाते हुए किसी को नहीं देखा गया। यह दोहा सांसारिक संग्रह की निरर्थकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि जब उनका मन गंगा के जल की भाँति निर्मल और पवित्र हो गया, तो स्वयं ईश्वर 'कबीर-कबीर' पुकारते हुए उनके पीछे-पीछे चलने लगे। तात्पर्य यह है कि मन की पवित्रता से ही ईश्वर स्वयं भक्त की ओर खिंचे चले आते हैं।
कबीर कहते हैं कि अधिकांश लोग केवल शरीर से योगी बनते हैं (बाहरी वेश धारण करते हैं), परंतु मन को कोई योगी नहीं बनाता। यदि मन ही योगी बन जाए तो सभी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। यह दोहा बाहरी आडंबर के बजाय मन की साधना पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि जिसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करता है, उसे कोई मार नहीं सकता। चाहे सारा संसार उसका शत्रु बन जाए, तब भी कोई उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकता। यह दोहा ईश्वर पर अटूट विश्वास और शरणागति का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि प्रेम न तो खेत में उगाया जा सकता है और न ही बाज़ार में बिकता है। राजा हो या प्रजा, जिसे भी सच्चा प्रेम चाहिए उसे अपना सिर (अहंकार) न्योछावर करके ही इसे पाना पड़ता है। प्रेम पाने के लिए पूर्ण समर्पण आवश्यक है।
कबीर कहते हैं कि प्रेम का बादल आकर मुझ पर बरस गया, जिससे मेरी अंतरात्मा भीतर तक भीग गई। अब वही भीगी हुई आत्मा ईश्वर से मिलने जा रही है। यह दोहा भक्ति-प्रेम में डूबकर ईश्वर-मिलन की अवस्था को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि यह शरीर विष की बेल के समान है, जबकि गुरु अमृत की खान हैं। यदि अपना सिर देकर भी सच्चा गुरु मिल जाए तो उसे सस्ता ही समझना चाहिए। यह दोहा गुरु की अनमोल महिमा को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि सारा संसार खा-पीकर और सोकर सुखी प्रतीत होता है। परंतु ईश्वर का दास कबीर दुखी है क्योंकि वह जागकर (संसार की नश्वरता और प्रभु-वियोग में) रोता है। यह दोहा सांसारिक सुख और आध्यात्मिक जागृति के अंतर को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि यह शरीर एक दिन चला जाएगा, इसलिए जब तक संभव है इसका सदुपयोग (भक्ति) कर लो। जिनके पास लाखों-करोड़ों की संपत्ति थी, वे भी खाली हाथ ही इस संसार से गए। यह दोहा धन-संग्रह की निरर्थकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि मैंने ज्ञान की अग्नि से अपने मोह-माया रूपी घर को जला दिया है और वही जलती मशाल हाथ में ले ली है। अब मैं उसी का घर (अहंकार और मोह) जलाने को तैयार हूँ जो मेरे साथ इस सत्य के मार्ग पर चलना चाहे। यह दोहा संपूर्ण समर्पण और मोह-त्याग की माँग करता है।
कबीर कहते हैं कि माया मीठी खांड (शक्कर) की तरह मन को मोह लेने वाली है। इसलिए भक्ति में स्थिर रहकर चंचल मन को संयम की डोर से बाँध लेना चाहिए। यह दोहा माया के आकर्षण से बचकर भक्ति में दृढ़ता का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि तेरा ईश्वर तेरे ही भीतर है, जैसे फूल में सुगंध समाई रहती है। परंतु मनुष्य उसे बाहर ढूँढता फिरता है, ठीक उस कस्तूरी मृग की तरह जो अपनी ही नाभि की सुगंध को वन में उदास होकर खोजता रहता है। यह दोहा आत्मा में ही परमात्मा के वास का बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि जो भक्त राम-नाम के रस में भीग जाता है, उसका वह प्रेम-रस कभी सूखता नहीं। उस अनुभूति और भाव को शब्दों में दिखाया नहीं जा सकता; वह तो अकथनीय कहानी है। यह दोहा भक्ति-अनुभव की अवर्णनीय गहराई को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि सच्चा साधु भक्ति-भाव का भूखा होता है, धन का नहीं। जो धन के लोभ में भटकता फिरता है, वह वास्तव में साधु है ही नहीं। यह दोहा सच्चे संत की पहचान बताता है।
कबीर कहते हैं कि यदि पत्थर पूजने से ईश्वर मिलते तो मैं तो पूरा पहाड़ ही पूज लेता। इससे तो चक्की का पत्थर भला है जो अनाज पीसकर संसार का पेट भरता है। यह दोहा बाहरी मूर्तिपूजा के आडंबर पर प्रश्न उठाकर सच्ची भक्ति की ओर संकेत करता है।
कबीर कहते हैं कि माला फेरते-फेरते युगों जैसा समय बीत गया, फिर भी मन का भटकाव दूर नहीं हुआ। इसलिए हाथ की माला छोड़कर मन के मनके (भटकाव) को सुधारो। यह दोहा बाहरी कर्मकांड की जगह मन की शुद्धि पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि मिट्टी तो एक ही है, पर उससे अनेक प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती हैं—घड़ा, सुराही, प्याला आदि अनेक नाम पा लेती हैं। इसी प्रकार सभी जीवों में एक ही परमात्मा का अंश है, भेद केवल नाम-रूप का है। यह दोहा ईश्वर की एकता और समानता का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जैसे प्राण के बिना देह व्यर्थ है, वैसे ही राम (ईश्वर) के बिना यह शरीर निरर्थक है। जब मन का मोह छूट जाता है तो जीव संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है। यह दोहा ईश्वर-स्मरण को जीवन का सार बताता है।
कबीर कहते हैं कि रात्रि में जितने तारे होते हैं, उतने ही आँसू (ईश्वर-वियोग में) मेरी आँखों से बहे हैं। रोते-रोते आँखें धुँधली हो गईं—राम से इस शरीर का मिलन कितना दुर्लभ है। यह दोहा प्रभु-विरह की तीव्र व्याकुलता को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि हे बंदे! तू मुझे कहाँ ढूँढता है, मैं तो तेरे ही पास (भीतर) हूँ। मैं न मंदिर में हूँ, न मस्जिद में, न काबा में और न कैलास में। यह दोहा ईश्वर को बाहरी स्थानों में नहीं, बल्कि अपने भीतर खोजने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि मैं न तो पूजा में हूँ, न नमाज़ में और न किसी अन्य धार्मिक कर्मकांड में। न मैं किसी दिशा-विशेष में हूँ, न लाहौर में और न हिंदू तीर्थस्थलों में। यह दोहा बताता है कि ईश्वर बाहरी आडंबरों में नहीं, सच्चे हृदय में बसता है।
कबीर कहते हैं कि यदि तू सच्चा खोजी है तो मैं तुझे पल भर की खोज में ही तुरंत मिल जाऊँगा। हे साधु भाइयो! सुनो—मैं तो श्रद्धा और विश्वास में ही निवास करता हूँ। यह दोहा सच्ची लगन और विश्वास से ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बताता है।
कबीर कहते हैं कि साधु की जाति मत पूछो, बल्कि अपने कर्मों को देखो। राम-नाम के स्मरण रूपी कर्म ही संसार-सागर से पार उतारने वाली नौका है। यह दोहा जाति-भेद से ऊपर उठकर सत्कर्म और भक्ति को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि जीवित अवस्था में मुझे ऐसा कोई नहीं मिला जिसके सान्निध्य से मैं स्वयं को बड़ा अनुभव करूँ। हे साधु भाइयो! सुनो—जो सच्चे रूप में (परमतत्त्व को) देख लेता है, वही श्रेष्ठ है। यह दोहा सच्चे आत्मदर्शन को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि जैसे तिल में तेल और चकमक पत्थर में अग्नि छिपी रहती है, वैसे ही तेरा ईश्वर तेरे ही भीतर विद्यमान है। यदि जाग सको तो जाग जाओ (आत्मबोध प्राप्त करो)। यह दोहा अंतर्मुखी होकर ईश्वर को भीतर पहचानने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि राम-नाम के स्मरण रूपी अमूल्य धन को जितना लूट सको, लूट लो (भरपूर भक्ति कर लो)। नहीं तो अंत समय में पछताओगे, जब प्राण शरीर छोड़कर चले जाएँगे। यह दोहा जीवित रहते ही प्रभु-भक्ति की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि प्रेम का बगुला उठा और एक तिनके को आकाश तक ले गया; अंततः तिनका तिनके से जा मिला और अपने मूल स्वभाव से अलग नहीं हुआ। यह दोहा इस सत्य की ओर संकेत करता है कि आत्मा अंततः अपने उद्गम (परमात्मा) में ही जा मिलती है।
कबीर कहते हैं कि ईश्वर को पाने के लिए जंगल में भटकने की आवश्यकता नहीं; घर में रहते हुए ही विरक्त भाव (अनासक्ति) रखो। जो भी प्रभु मिलना है, वह यहीं गृहस्थ जीवन में रहकर मिल जाएगा। यह दोहा सांसारिक जीवन में रहते हुए भी भक्ति-साधना संभव होने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि भूख कुतिया के समान है जो भजन-साधना में बार-बार विघ्न डालती है। इसलिए इसे थोड़ा-सा भोजन रूपी टुकड़ा डालकर शांत कर दो और फिर निश्चिंत होकर प्रभु-स्मरण करो। यह दोहा बताता है कि शरीर की मूल आवश्यकताएँ पूरी कर मन को साधना में लगाना चाहिए।
कबीर कहते हैं कि जब तक मुझमें अहंकार ('मैं') था, तब तक ईश्वर के दर्शन न हुए; और अब जब ईश्वर प्रकट हुए तो 'मैं' मिट गया। जैसे ही भीतर ज्ञान का दीपक दिखाई दिया, अज्ञान का सारा अंधकार दूर हो गया। यह दोहा अहंकार के नाश से आत्मज्ञान की प्राप्ति बताता है।
कबीर कहते हैं कि जीवन रूपी नाव भवसागर के बीच फँसी है; गुरु के बिना इसे पार कौन लगाएगा? हे साधु भाइयो! सुनो—गुरु के बिना मन को शांति और सहारा नहीं मिलता। यह दोहा भवसागर पार करने में गुरु की अनिवार्यता बताता है।
कबीर कहते हैं कि कस्तूरी मृग की अपनी नाभि में बसती है, फिर भी वह उसे वन में ढूँढता फिरता है। ठीक इसी प्रकार राम (ईश्वर) हर हृदय में विद्यमान हैं, परंतु संसार उन्हें अपने भीतर देख नहीं पाता। यह दोहा आत्मा में ही परमात्मा के वास का बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि हरि-नाम के रस को सच्चे अर्थों में तभी पीया हुआ जानो जब उसका नशा (आनंद) कभी न उतरे। ऐसे प्रेमरस के बिना काँटों भरे इस संसार-सागर से कोई कैसे पार उतर सकता है? यह दोहा अखंड भक्ति-रस की महत्ता बताता है।
कबीर विनम्रता से कहते हैं कि हे पिता रूप प्रभु! मुझ दीन के सारे अवगुण क्षमा कर दें। हे साधु भाइयो! सुनो—मैं तो बस हरि के चरणों में ही शरण लिए बैठा हूँ। यह दोहा दीनता और ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि भक्ति चौगान (पोलो) के खेल की गेंद के समान है, जिसे जो चाहे प्रेम से अपना ले। सच्चे खिलाड़ी (भक्त) तो हर हाल में प्रसन्न रहते हैं—चाहे जीतें या हार जाएँ। यह दोहा निष्काम और आनंदमय भक्ति का भाव दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि यदि उस एक परमतत्त्व को नहीं जाना तो बहुत कुछ जान लेने से क्या लाभ? जो उस एक को जान लेता है वह सब कुछ जान लेता है, और जो अनेक (बाहरी ज्ञान) में उलझा रहता है वह सब कुछ खो देता है। यह दोहा एकमात्र ब्रह्म-ज्ञान को सर्वोपरि बताता है।
कबीर कहते हैं कि जब राम ने (मृत्यु रूपी) बुलावा भेजा तो वे रो पड़े, क्योंकि साधु-संतों की संगति में जो सुख मिलता है वह तो बैकुंठ (स्वर्ग) में भी नहीं है। यह दोहा सत्संग के अनुपम आनंद को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ बताता है।
कबीर कहते हैं कि गुरु के बिना तू कितना भी खोज ले, सच्चा उत्तर (आत्मज्ञान) नहीं मिलता। हे साधु भाइयो! सुनो—सच्चा गुरु तो कोई बिरला ही होता है। यह दोहा सद्गुरु की दुर्लभता और आवश्यकता दोनों को रेखांकित करता है।
कबीर कहते हैं कि बार-बार नहाने-धोने से क्या लाभ, यदि मन का मैल (विकार) न धुले? जैसे मछली सदा जल में रहती है, फिर भी उसकी गंध नहीं जाती। यह दोहा बाहरी शुद्धि से अधिक मन की आंतरिक शुद्धि पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि मोह की फाँसी गले में पड़ी है, फिर भी मूर्ख मनुष्य सचेत नहीं हो पाता। एक राम के अतिरिक्त और कोई सच्चा सहारा नहीं है, परंतु जड़बुद्धि इस सत्य को नहीं जान पाता। यह दोहा मोह के बंधन और एकमात्र प्रभु-शरण के महत्व को बताता है।
कबीर कहते हैं कि जिसने प्रेम (ईश्वर-प्रेम) का स्वाद नहीं चखा और उसके सार को नहीं पहचाना, उसका जीवन सूने घर के अतिथि जैसा है जो जैसे आया वैसे ही खाली लौट जाता है। यह दोहा प्रेम और भक्ति के बिना जीवन को निरर्थक बताता है।
कबीर कहते हैं कि तू केवल पुस्तकों में लिखी बातों के आधार पर बोलता है, जबकि मैं अपनी आँखों से देखे (स्वयं अनुभव किए) सत्य की बात करता हूँ। मैं तो उलझन सुलझाने वाली बात कहता हूँ, पर तू उसे और उलझाए रखता है। यह दोहा पुस्तकीय ज्ञान पर आत्मानुभव की श्रेष्ठता बताता है।
कबीर कहते हैं कि घर में रहकर भी सच्चे भाव से प्रभु को भजे वही असली भक्त है, जबकि केवल बाहर साधु का वेश धारण कर लेना दिखावा मात्र है। यदि मन माया के पीछे भागता रहे तो वेश बदलने से कोई साधु नहीं बन जाता। यह दोहा बाहरी वेश से अधिक मन की वृत्ति को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि गुरु की आज्ञा के अनुसार ही आना-जाना (हर कार्य) करना चाहिए। सच्चा संत वही है जो गुरु की कठिन से कठिन आज्ञा को भी सहर्ष सहन कर ले। यह दोहा गुरु-आज्ञा के पालन और समर्पण की महत्ता बताता है।
कबीर कहते हैं कि यदि समूची धरती को कागज़, समस्त वनों को कलम और सातों समुद्रों को स्याही बना लूँ, तब भी गुरु के गुणों (महिमा) को लिखकर पूरा नहीं किया जा सकता। यह दोहा गुरु की अपार और अवर्णनीय महिमा को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि हे मुल्ला! केवल मस्जिद जाने से क्या, जब तेरे मन में सच्ची आस्था ही नहीं तो तू कैसी नमाज़ पढ़ेगा? तू पाँचों समय नमाज़ तो पढ़ेगा, पर उसमें हर पल हृदय (सच्चा भाव) उपस्थित नहीं रहता। यह दोहा बाहरी कर्मकांड के बजाय हृदय की सच्ची भक्ति पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि जब तक संसार के मोह-संबंधों से लगाव बना रहता है, तब तक सच्ची भक्ति नहीं हो पाती। जो मोह के बंधन तोड़कर हरि का भजन करता है, वही सच्चा भक्त कहलाता है। यह दोहा भक्ति के लिए मोह-त्याग की आवश्यकता बताता है।
कबीर ईश्वर से कहते हैं कि मुझमें मेरा अपना कुछ भी नहीं, जो कुछ है वह सब तेरा ही है। तेरी ही दी हुई वस्तु तुझे लौटाने में मेरा क्या लगता है? यह दोहा पूर्ण समर्पण और अहंकार-शून्यता की पराकाष्ठा को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि सब लोग 'मेरा-मेरा' करते रहते हैं, पर सचमुच किसका कौन अपना है? जिसने स्वयं को हरि को समर्पित कर दिया, वही सदा के लिए (अमर रूप में) अपना हो जाता है। यह दोहा सांसारिक 'अपनेपन' की मिथ्या पर ईश्वर-समर्पण की श्रेष्ठता बताता है।
कबीर कहते हैं कि कच्चा फल हरा (अपरिपक्व) ही रहता है और बहुत से जीव बिना परिपक्व (आत्मज्ञान को प्राप्त) हुए ही मर जाते हैं। परंतु सच्चा साधु ऐसा होता है जो लाखों लोगों को (भवसागर से) तार देता है। यह दोहा सच्चे संत की उद्धारक शक्ति को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि जहाँ अहंकार ('आप') है वहाँ विपत्ति है और जहाँ संशय है वहाँ (मन का) रोग है। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि मनुष्य ने स्वयं को ईश्वर से नहीं जोड़ा। यह दोहा अहंकार व संशय के दुष्परिणाम और प्रभु-योग की आवश्यकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि यह जीवन रूपी नाव जर्जर है और (अयोग्य) खेवनहार भी दोषपूर्ण है। जो मन से हलके (मोह-रहित) थे, वे सहज ही पार उतर गए, परंतु जिनके मन पर मोह-अहंकार का भारी बोझ था, वे डूब गए। यह दोहा मन को हलका (निर्मोही) रखकर भवसागर पार करने की सीख देता है।
कबीर कहते हैं कि जैसे घास खाए बिना घोड़ा एक कदम भी नहीं चल पाता, वैसे ही भूखे पेट भजन-साधना भी नहीं हो पाती। इसलिए पहले रोटी खाकर शरीर की आवश्यकता पूरी करो, फिर निश्चिंत होकर प्रभु का भजन करो। यह दोहा संतुलित और व्यावहारिक साधना का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि प्रेम (नेह) न तो बगिया में उगता है और न बाज़ार में बिकता है। राजा हो या प्रजा, जिसे भी सच्चा प्रेम चाहिए उसे अपना सिर (अहंकार) उठाकर न्योछावर करना ही पड़ता है। यह दोहा सच्चे प्रेम के लिए पूर्ण समर्पण की आवश्यकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि ज्ञान के बिना सारा संसार भटकता रहता है, इसलिए हे मन! तू रात-दिन सचेत रह। हे साधु भाइयो! सुनो—हरि-नाम के स्मरण से ही सौभाग्य (कल्याण) प्राप्त होता है। यह दोहा ज्ञान और हरि-नाम को जीवन का आधार बताता है।
कबीर कहते हैं कि सुंदर शरीर पाकर भी यदि मनुष्य सुंदर (अच्छे) कर्म न करे, तो वह शरीर किस काम का जिसमें राम (ईश्वर का स्मरण) ही न हो? यह दोहा शरीर की सार्थकता सत्कर्म और प्रभु-स्मरण में बताता है।
कबीर कहते हैं कि बकरी तो केवल पत्ते खाती है, फिर भी उसकी खाल खींची जाती है। फिर जो मनुष्य ऊपर से तो राम-राम कहता है पर भीतर कुटिलता और कठोरता से भरा है, उसकी क्या दशा होगी? यह दोहा बाहरी दिखावे और भीतरी कपट के अंतर पर चेतावनी देता है।
कबीर प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! संसार को भले ही सांसारिक भोग-वस्तुएँ दें, परंतु मुझे तो ब्रह्म-ज्ञान दें। लोग संसार के धोखे (मोह) में ही पड़े रहते हैं और इसी में सारा जीवन-संसार बीत जाता है। यह दोहा सांसारिक मोह से ऊपर ब्रह्म-ज्ञान की कामना व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि संसार में एक जीव दूसरे जीव को खाता है, परंतु सच्चा संत मांस नहीं खाता (किसी जीव की हिंसा नहीं करता)। हे जीव! तू अहिंसक होकर जी और राम के समीप रहकर अपने भाव को सींच। यह दोहा अहिंसा और प्रभु-सान्निध्य का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि हिंदू और मुसलमान दोनों को एक ही करता (ईश्वर) ने रचा है। भले ही दोनों अलग-अलग राहों पर चलते हों, पर अंततः उनका घर और द्वार (परमात्मा) एक ही है। यह दोहा धार्मिक एकता और ईश्वर के एकत्व का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि राम और रहीम एक ही हैं, बस उन्हें दो अलग नाम दे दिए गए हैं। जो इस सत्य को समझ लेता है, वही सच्चा साधु है। यह दोहा ईश्वर के एकत्व और साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि इस संसार में जो व्यक्ति सच्चे संत की शरण ले लेता है, वह उन भक्तजनों के सहारे भवसागर के पार पहुँच जाता है। यह दोहा संत-शरण को मुक्ति का साधन बताता है।
कबीर कहते हैं कि हर कोई अपनी-अपनी इच्छा रखता है और अपनी-अपनी बात बोलता है। परंतु जो सच्चे मन से ईश्वर को चाहते हैं, वे उसके लिए कोई भी मूल्य (समर्पण) चुकाने को तैयार रहते हैं। यह दोहा सच्ची ईश्वर-चाह के लिए पूर्ण समर्पण की भावना दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि सद्गुरु का सान्निध्य प्राप्त है, इसलिए प्रतिदिन सत्संग करना चाहिए। हे भाई! सुनो—इस नित्य सत्संग से ही मन सांसारिक बंधनों से मुक्त (अतीत) हो जाता है। यह दोहा नियमित सत्संग के महत्व को रेखांकित करता है।
कबीर कहते हैं कि शरीर की साधना से बढ़कर मन की साधना है—असली बात तब है जब मन ही योगी (साधक) बन जाए। जो इस मन की साधना को प्राप्त कर लेता है, वही सच्चा साधु होता है। यह दोहा बाहरी योग की जगह मन की साधना पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि सच्चा ज्ञानी निर्भय हो जाता है, जबकि अभिमानी केवल हठयोग (बाहरी क्रियाओं) में उलझा रहता है। पर वे कहते हैं कि हरि के भजन के बिना संसार रूपी रोग (जन्म-मरण का चक्र) नहीं मिटता। यह दोहा हठयोग के अभिमान से ऊपर हरि-भजन को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि हृदय के मर्म (सच्चे भाव) को जाने बिना मनुष्य चाहे जितना भी नाम-जप कर ले, वह व्यर्थ है। हे भाई! सुनो—भीतरी सच्चाई और भाव के बिना कोई भी साधना सफल नहीं होती। यह दोहा बाहरी जप से अधिक हृदय के सच्चे भाव को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि सत्य के समान कोई तप नहीं और झूठ के समान कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सत्य का वास है, उसी के हृदय में स्वयं ईश्वर निवास करते हैं। यह दोहा सत्य को सर्वोच्च तप और ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बताता है।
कबीर कहते हैं कि सच्ची प्रीति केवल एक राम (ईश्वर) से करनी चाहिए, शेष सब (सांसारिक प्रेम) निरर्थक है। जब तक मनुष्य माया के नशे में डूबा रहेगा, तब तक उसे राम कभी नहीं मिलेंगे। यह दोहा माया-मोह त्यागकर एकनिष्ठ ईश्वर-प्रेम का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जहाँ काम (विषय-वासना) है वहाँ ईश्वर का नाम नहीं ठहरता, और जहाँ नाम है वहाँ काम नहीं रहता। यदि कोई इन दोनों को एक साथ रखने का दावा करे तो वह अज्ञान का घर है। यह दोहा वासना और भक्ति के परस्पर विरोध को स्पष्ट करता है।
कबीर कहते हैं कि केवल पत्थर पूजने और तीर्थों में घूमने से क्या प्राप्त होता है? हे भाई! सच्ची भक्ति तो यह है कि पहले अपने मन का मैल (विकार) मिटाओ। यह दोहा बाहरी कर्मकांड के बजाय मन की शुद्धि पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि पाप से पाप नहीं कटता और एक पाप से दूसरा पाप नहीं मिटता। पापों का संताप तो केवल राम-नाम के जप से ही दूर होता है। यह दोहा प्रायश्चित और पाप-मुक्ति के लिए हरि-नाम को एकमात्र उपाय बताता है।
कबीर कहते हैं कि इस संसार के सारे व्यवहार (सांसारिक लेन-देन और संबंध) झूठे एवं नश्वर हैं। जो व्यक्ति अपनी जीवन-नौका को राम-नाम के सहारे खेता है, वही भवसागर के पार उतरता है। यह दोहा सांसारिक मिथ्या से ऊपर हरि-नाम के आश्रय को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि हे भाई! देखो, ज्ञान की लहर आई है—अब ज्ञान और विवेक का चिंतन जाग्रत करो। हे साधु भाइयो! सुनो—सच्चे ज्ञान से ही जीव का उद्धार (मुक्ति) होता है। यह दोहा आत्मज्ञान को मुक्ति का साधन बताता है।
कबीर कहते हैं कि जब मन राम (ईश्वर) से जुड़ जाता है, तब मनुष्य को सभी सुख स्वतः प्राप्त हो जाते हैं। हे साधु भाइयो! सुनो—अपने मन को राम में लगा दो। यह दोहा मन को ईश्वर में लगाकर परम सुख पाने का संदेश देता है।