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23 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
कबीर दास के अनुसार अहंकार ही ईश्वर-प्राप्ति का सबसे बड़ा बाधक है। "जब मैं था तब हरि नहीं" जैसे दोहे अहंकार-त्याग और विनम्रता का संदेश देते हैं। नीचे अहंकार पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित पढ़ें।
कबीर कहते हैं कि जब तक मुझमें 'मैं' अर्थात अहंकार था, तब तक ईश्वर नहीं मिले; और अब जब ईश्वर मिल गए तो 'मैं' नहीं रहा। प्रेम की गली बहुत सँकरी है, उसमें अहंकार और ईश्वर दोनों एक साथ नहीं समा सकते। ईश्वर-प्राप्ति के लिए अहंकार का त्याग आवश्यक है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य को ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिसमें अहंकार न हो। ऐसी वाणी दूसरों को तो शीतलता और सुख देती ही है, साथ ही बोलने वाले के मन को भी शांति प्रदान करती है। यह दोहा मधुर और विनम्र वाणी का महत्व बताता है।
कबीर कहते हैं कि मिट्टी कुम्हार से कहती है कि तू मुझे क्या रौंदता है? एक दिन ऐसा भी आएगा जब मैं तुझे (तेरे शव को अपने भीतर समाकर) रौंदूँगी। यह दोहा मनुष्य के अहंकार पर चोट करते हुए मृत्यु की अनिवार्यता और नश्वरता का स्मरण कराता है।
कबीर कहते हैं कि प्रेम न तो खेत में उगाया जा सकता है और न ही बाज़ार में बिकता है। राजा हो या प्रजा, जिसे भी सच्चा प्रेम चाहिए उसे अपना सिर (अहंकार) न्योछावर करके ही इसे पाना पड़ता है। प्रेम पाने के लिए पूर्ण समर्पण आवश्यक है।
कबीर कहते हैं कि मैंने ज्ञान की अग्नि से अपने मोह-माया रूपी घर को जला दिया है और वही जलती मशाल हाथ में ले ली है। अब मैं उसी का घर (अहंकार और मोह) जलाने को तैयार हूँ जो मेरे साथ इस सत्य के मार्ग पर चलना चाहे। यह दोहा संपूर्ण समर्पण और मोह-त्याग की माँग करता है।
कबीर कहते हैं कि अपनी गली में तो कुत्ता भी शेर बनकर अकड़ता है, परंतु परदेस में जाने पर वही पूँछ दबाकर चलता है। यह दोहा बताता है कि अपने क्षेत्र का बल और अहंकार स्थायी नहीं होता—विनम्रता ही श्रेष्ठ है।
कबीर कहते हैं कि खजूर के पेड़ की तरह केवल बड़ा (ऊँचा) हो जाने से क्या लाभ, जो न तो राहगीर को छाया देता है और जिसके फल भी इतने ऊँचे लगते हैं कि सहज नहीं मिलते। यह दोहा बताता है कि बड़प्पन तभी सार्थक है जब वह दूसरों के काम आए।
कबीर कहते हैं कि कभी अहंकार मत करो, क्योंकि काल (मृत्यु) ने तुम्हारे बाल पकड़ रखे हैं। पता नहीं कब और किस लोक में यह जीवन उड़कर चला जाए। यह दोहा अहंकार त्यागकर मृत्यु की अनिश्चितता का स्मरण कराता है।
कबीर कहते हैं कि जब तक मुझमें अहंकार ('मैं') था, तब तक ईश्वर के दर्शन न हुए; और अब जब ईश्वर प्रकट हुए तो 'मैं' मिट गया। जैसे ही भीतर ज्ञान का दीपक दिखाई दिया, अज्ञान का सारा अंधकार दूर हो गया। यह दोहा अहंकार के नाश से आत्मज्ञान की प्राप्ति बताता है।
कबीर विनम्रता से कहते हैं कि हे पिता रूप प्रभु! मुझ दीन के सारे अवगुण क्षमा कर दें। हे साधु भाइयो! सुनो—मैं तो बस हरि के चरणों में ही शरण लिए बैठा हूँ। यह दोहा दीनता और ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि यदि मन शांत और शीतल हो जाए तो संसार में कोई शत्रु नहीं रहता। अपने अहंकार को त्याग दो, फिर सभी तुम पर दया और स्नेह करेंगे। यह दोहा मन की शांति और अहंकार-त्याग का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जो कुछ भी है वह सब ईश्वर का है, फिर तू उसे 'मेरा' क्यों कहता है? जब तू स्वयं ही नहीं रहेगा, तब तेरे लिए यह सुबह (सांसारिक वैभव) कहाँ रहेगी? यह दोहा 'मेरेपन' के मिथ्या अहंकार को उजागर करता है।
कबीर कहते हैं कि साधु तो अतिथि बनकर (ज्ञान बाँटने) आया, परंतु मूर्ख मनुष्य उल्टा उसे ही उपदेश देने लगा—यह विपरीत बुद्धि उसकी समझ में नहीं आई। यह दोहा अहंकारवश ज्ञानी का मूल्य न पहचानने वाले की मूर्खता पर व्यंग्य करता है।
कबीर ईश्वर से कहते हैं कि मुझमें मेरा अपना कुछ भी नहीं, जो कुछ है वह सब तेरा ही है। तेरी ही दी हुई वस्तु तुझे लौटाने में मेरा क्या लगता है? यह दोहा पूर्ण समर्पण और अहंकार-शून्यता की पराकाष्ठा को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि सब लोग 'मेरा-मेरा' करते रहते हैं, पर सचमुच किसका कौन अपना है? जिसने स्वयं को हरि को समर्पित कर दिया, वही सदा के लिए (अमर रूप में) अपना हो जाता है। यह दोहा सांसारिक 'अपनेपन' की मिथ्या पर ईश्वर-समर्पण की श्रेष्ठता बताता है।
कबीर कहते हैं कि जहाँ अहंकार ('आप') है वहाँ विपत्ति है और जहाँ संशय है वहाँ (मन का) रोग है। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि मनुष्य ने स्वयं को ईश्वर से नहीं जोड़ा। यह दोहा अहंकार व संशय के दुष्परिणाम और प्रभु-योग की आवश्यकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि पानी ऊँचाई पर नहीं ठहरता, वह नीचे (निचले स्थान) पर ही टिकता है। इसी प्रकार जहाँ नम्रता होती है, वही नीचा (विनम्र) व्यक्ति वास्तव में सबसे ऊँचा होता है। यह दोहा विनम्रता को सच्ची श्रेष्ठता बताता है।
कबीर कहते हैं कि जीवन बहुत छोटा है, फिर तू किस बात का अहंकार करता है? तू खाली हाथ इस संसार में आया था और खाली हाथ ही जाएगा—फिर तेरी यह शान किस काम की? यह दोहा जीवन की क्षणभंगुरता और अहंकार की निरर्थकता दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि जब तक मन में काम, क्रोध, मद (अहंकार) और लोभ की खान (भंडार) भरी है, तब तक साधना सिद्ध नहीं होती। वे संतों को सावधान करते हैं कि इन विकारों से सदा सतर्क रहो। यह दोहा मन के प्रमुख विकारों से बचने की चेतावनी देता है।
कबीर कहते हैं कि प्रेम (नेह) न तो बगिया में उगता है और न बाज़ार में बिकता है। राजा हो या प्रजा, जिसे भी सच्चा प्रेम चाहिए उसे अपना सिर (अहंकार) उठाकर न्योछावर करना ही पड़ता है। यह दोहा सच्चे प्रेम के लिए पूर्ण समर्पण की आवश्यकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि ऊँचे कुल में जन्म लेने मात्र से कोई श्रेष्ठ नहीं हो जाता, यदि उसके कर्म ऊँचे न हों। जैसे बाँस ऊँचा तो होता है, परंतु उसमें (चंदन जैसी) सुगंध कहाँ होती है? यह दोहा कुल से अधिक सत्कर्म को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि सच्चा ज्ञानी निर्भय हो जाता है, जबकि अभिमानी केवल हठयोग (बाहरी क्रियाओं) में उलझा रहता है। पर वे कहते हैं कि हरि के भजन के बिना संसार रूपी रोग (जन्म-मरण का चक्र) नहीं मिटता। यह दोहा हठयोग के अभिमान से ऊपर हरि-भजन को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि मन स्वयं को राजा समझकर बैठा है और अपनी बुद्धि को असीम मानता है (अहंकार में डूबा है)। पर वे कहते हैं कि हे साधु! गुरु के बिना तो केवल अज्ञान का अंधकार ही है। यह दोहा मन के अहंकार पर चोट करते हुए गुरु की आवश्यकता बताता है।