जो घट प्रेम न संचरे, जो घट जान सुजान।
जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिन प्रान॥
jo ghat prem na sanchare, jo ghat jaan sujaan.
jaise khaal luhaar kee, saans let bin praan.
— कबीर दास
हिंदी व्याख्या
कबीर कहते हैं कि जिस हृदय में प्रेम का संचार नहीं होता, उसे निष्प्राण ही समझो। वह लोहार की धौंकनी के समान है जो साँस तो लेती है, परंतु जिसमें जीवन नहीं होता। यह दोहा प्रेमरहित जीवन को निरर्थक बताता है।