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66 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
कबीर दास के मन पर दोहे चंचल मन को साधने और उसे ईश्वर में लगाने का मार्ग दिखाते हैं। "मन के हारे हार है" जैसे दोहे मन की शक्ति का बोध कराते हैं। पढ़िए मन पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित।
कबीर कहते हैं कि जब मैं संसार में बुराई ढूँढने निकला तो मुझे कोई बुरा नहीं मिला। परंतु जब मैंने अपने ही मन के भीतर झाँककर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं। तात्पर्य यह है कि दूसरों के दोष देखने के बजाय हमें पहले अपने भीतर के अवगुणों को पहचानकर उन्हें सुधारना चाहिए।
कबीर समझाते हैं कि हे मन! धैर्य रखो, संसार में हर काम अपने उचित समय पर ही होता है। जैसे माली चाहे सौ घड़े पानी से पेड़ को सींच ले, फल तो ऋतु आने पर ही लगते हैं। इसलिए जल्दबाज़ी छोड़कर धैर्य और निरंतर प्रयास में विश्वास रखना चाहिए।
कबीर कहते हैं कि अपनी निंदा करने वाले को अपने पास ही रखना चाहिए, चाहे आँगन में उसके लिए झोपड़ी ही क्यों न बनवानी पड़े। क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के ही हमारे स्वभाव और आचरण को निर्मल कर देता है। आलोचक हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधरने का अवसर देता है।
कबीर कहते हैं कि किसी भी बात की अति अच्छी नहीं होती। न तो बहुत अधिक बोलना अच्छा है और न ही बहुत अधिक चुप रहना; न अधिक वर्षा अच्छी है और न अधिक धूप। यह दोहा जीवन में संतुलन और मध्यम मार्ग अपनाने की शिक्षा देता है।
कबीर कहते हैं कि मन के हार मान लेने में ही हार है और मन के जीतने में ही जीत है। परब्रह्म (ईश्वर) की प्राप्ति भी मन के विश्वास और दृढ़ता से ही होती है। यह दोहा आत्मविश्वास और मन की शक्ति के महत्व को रेखांकित करता है।
कबीर कहते हैं कि वे संसार रूपी बाज़ार में खड़े होकर सभी के कल्याण की कामना करते हैं। उनका न तो किसी से विशेष मित्रता का स्वार्थ है और न किसी से बैर। यह दोहा निष्पक्षता, समभाव और सबके प्रति सद्भावना का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जिसकी सारी इच्छाएँ मिट गईं, चिंताएँ समाप्त हो गईं और मन निश्चिंत हो गया, वही सच्चा सुखी है। जिसे संसार से कुछ नहीं चाहिए, वही वास्तव में बादशाहों का बादशाह है। यह दोहा निःस्पृहता और संतोष को सबसे बड़ा धन बताता है।
कबीर कहते हैं कि हे मनुष्य! तू इस संसार में किस उद्देश्य से आया था, और चादर तानकर अज्ञानता की नींद में सो रहा है। हे लापरवाह! अब सचेत हो जा और अपने सच्चे स्वरूप (आत्मा) को पहचान। यह दोहा आत्मज्ञान और जीवन के उद्देश्य की ओर जगाता है।
कबीर कहते हैं कि जब उनका मन गंगा के जल की भाँति निर्मल और पवित्र हो गया, तो स्वयं ईश्वर 'कबीर-कबीर' पुकारते हुए उनके पीछे-पीछे चलने लगे। तात्पर्य यह है कि मन की पवित्रता से ही ईश्वर स्वयं भक्त की ओर खिंचे चले आते हैं।
कबीर कहते हैं कि अधिकांश लोग केवल शरीर से योगी बनते हैं (बाहरी वेश धारण करते हैं), परंतु मन को कोई योगी नहीं बनाता। यदि मन ही योगी बन जाए तो सभी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। यह दोहा बाहरी आडंबर के बजाय मन की साधना पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य दूसरों के दोष देखकर हँसता हुआ चलता रहता है, परंतु अपने स्वयं के दोष उसे याद ही नहीं आते, जिनका न आदि है न अंत। यह दोहा हमें दूसरों की आलोचना छोड़कर अपने भीतर के अनगिनत अवगुणों को देखने की सीख देता है।
कबीर कहते हैं कि जहाँ दया होती है वहीं धर्म का वास है, और जहाँ लोभ है वहाँ पाप है। जहाँ क्रोध है वहाँ काल (मृत्यु) है और जहाँ क्षमा है वहाँ स्वयं ईश्वर का निवास है। यह दोहा सद्गुणों और दुर्गुणों का परिणाम स्पष्ट करता है।
कबीर कहते हैं कि जो व्यक्ति तुम्हारे मार्ग में काँटे बोए, तुम उसके लिए फूल बोना। ऐसा करने से तुम्हें तो फूल ही फूल मिलेंगे, परंतु उसके हिस्से त्रिशूल समान कष्ट आएँगे। यह दोहा बुराई के बदले भलाई करने की उदात्त शिक्षा देता है।
कबीर कहते हैं कि रखवाले के बिना चिड़ियों ने खेत चुग लिया; अब आधा-अधूरा ही बचा है। हे मनुष्य! जितना अभी बचा है, उसी में सचेत होकर सँभल जा। यह दोहा जीवन रूपी अवसर के नष्ट होने से पहले सजग होने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि माया मीठी खांड (शक्कर) की तरह मन को मोह लेने वाली है। इसलिए भक्ति में स्थिर रहकर चंचल मन को संयम की डोर से बाँध लेना चाहिए। यह दोहा माया के आकर्षण से बचकर भक्ति में दृढ़ता का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि माया और छाया एक जैसी होती हैं, इस रहस्य को बिरला ही समझ पाता है। यह माया भागते हुए भक्त के पीछे-पीछे दौड़ती है, परंतु जो साहसपूर्वक इसका सामना करता है, उससे यह स्वयं दूर भाग जाती है। तात्पर्य यह कि माया से डरकर भागने के बजाय निर्भय होकर उसका सामना करना चाहिए।
कबीर कहते हैं कि अच्छी संगति से सुख मिलता है और बुरी संगति से दुख। इसलिए यदि अपना कल्याण चाहते हो तो सदैव साधु-संतों की संगति करो। यह दोहा जीवन में संगति के महत्व को रेखांकित करता है।
कबीर कहते हैं कि तेरा ईश्वर तेरे ही भीतर है, जैसे फूल में सुगंध समाई रहती है। परंतु मनुष्य उसे बाहर ढूँढता फिरता है, ठीक उस कस्तूरी मृग की तरह जो अपनी ही नाभि की सुगंध को वन में उदास होकर खोजता रहता है। यह दोहा आत्मा में ही परमात्मा के वास का बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि शरीर पक्षी के समान हो गया है—मन जहाँ जाता है, वह वहीं उड़ जाता है। मनुष्य जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। यह दोहा मन की चंचलता और संगति के परिणाम दोनों पर प्रकाश डालता है।
कबीर कहते हैं कि माला फेरते-फेरते युगों जैसा समय बीत गया, फिर भी मन का भटकाव दूर नहीं हुआ। इसलिए हाथ की माला छोड़कर मन के मनके (भटकाव) को सुधारो। यह दोहा बाहरी कर्मकांड की जगह मन की शुद्धि पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि जिस हृदय में प्रेम का संचार नहीं होता, उसे निष्प्राण ही समझो। वह लोहार की धौंकनी के समान है जो साँस तो लेती है, परंतु जिसमें जीवन नहीं होता। यह दोहा प्रेमरहित जीवन को निरर्थक बताता है।
कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहरें मोती तट पर ले आती हैं, परंतु बगुला उन्हें परखना नहीं जानता, जबकि हंस केवल श्रेष्ठ (मोती) ही चुनता है। यह दोहा बताता है कि विवेकी व्यक्ति ही सार-असार का भेद पहचानकर श्रेष्ठ को ग्रहण करता है।
कबीर कहते हैं कि कहते-सुनते सारे दिन बीत गए, फिर भी मनुष्य न तो सांसारिक उलझनों में पूरी तरह उलझा और न ही उनसे सुलझ पाया। हे मनुष्य! अब सचेत हो जा, आखिर कब तक यूँ ही भटकता रहेगा? यह दोहा आत्मचिंतन और जागृति की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि वाणी अनमोल है, परंतु इसका मूल्य वही जानता है जो सोच-समझकर बोलता है। शब्दों को पहले हृदय रूपी तराजू में तौल लेना चाहिए, तभी उन्हें मुख से बाहर निकालना चाहिए। यह दोहा सोच-समझकर मधुर बोलने की शिक्षा देता है।
कबीर कहते हैं कि न माया मरी और न मन मरा, केवल शरीर बार-बार मरते रहे (जन्म-मरण होता रहा)। आशा और तृष्णा कभी समाप्त नहीं हुईं—ऐसा दास कबीर कह गए हैं। यह दोहा अंतहीन इच्छाओं और तृष्णा के बंधन को उजागर करता है।
कबीर कहते हैं कि यदि तू सच्चा खोजी है तो मैं तुझे पल भर की खोज में ही तुरंत मिल जाऊँगा। हे साधु भाइयो! सुनो—मैं तो श्रद्धा और विश्वास में ही निवास करता हूँ। यह दोहा सच्ची लगन और विश्वास से ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बताता है।
कबीर कहते हैं कि जैसे तिल में तेल और चकमक पत्थर में अग्नि छिपी रहती है, वैसे ही तेरा ईश्वर तेरे ही भीतर विद्यमान है। यदि जाग सको तो जाग जाओ (आत्मबोध प्राप्त करो)। यह दोहा अंतर्मुखी होकर ईश्वर को भीतर पहचानने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि अपनी गली में तो कुत्ता भी शेर बनकर अकड़ता है, परंतु परदेस में जाने पर वही पूँछ दबाकर चलता है। यह दोहा बताता है कि अपने क्षेत्र का बल और अहंकार स्थायी नहीं होता—विनम्रता ही श्रेष्ठ है।
कबीर कहते हैं कि कभी अहंकार मत करो, क्योंकि काल (मृत्यु) ने तुम्हारे बाल पकड़ रखे हैं। पता नहीं कब और किस लोक में यह जीवन उड़कर चला जाए। यह दोहा अहंकार त्यागकर मृत्यु की अनिश्चितता का स्मरण कराता है।
कबीर कहते हैं कि ईश्वर को पाने के लिए जंगल में भटकने की आवश्यकता नहीं; घर में रहते हुए ही विरक्त भाव (अनासक्ति) रखो। जो भी प्रभु मिलना है, वह यहीं गृहस्थ जीवन में रहकर मिल जाएगा। यह दोहा सांसारिक जीवन में रहते हुए भी भक्ति-साधना संभव होने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जिसका मन मैला हो पर शरीर (बाहरी रूप) उजला हो, वह बगुले के समान कपटी है। ऐसे पाखंडी से तो कौआ भला है जिसका तन और मन एक ही रंग का (निष्कपट) है। यह दोहा बाहरी दिखावे से अधिक भीतरी सच्चाई को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि भूख कुतिया के समान है जो भजन-साधना में बार-बार विघ्न डालती है। इसलिए इसे थोड़ा-सा भोजन रूपी टुकड़ा डालकर शांत कर दो और फिर निश्चिंत होकर प्रभु-स्मरण करो। यह दोहा बताता है कि शरीर की मूल आवश्यकताएँ पूरी कर मन को साधना में लगाना चाहिए।
कबीर कहते हैं कि केवल पढ़-पढ़कर मनुष्य पत्थर जैसा कठोर और लिख-लिखकर ईंट जैसा जड़ हो गया। हे मनुष्य! ऐसी विद्या पढ़ने से क्या लाभ, यदि तेरे मन में मिठास (कोमलता और प्रेम) न आई? यह दोहा शुष्क पुस्तकीय ज्ञान के बजाय हृदय की कोमलता पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि जब गुणों का सच्चा पारखी (ग्राहक) मिल जाए तो गुण लाखों में बिकते हैं, अर्थात उनका पूरा सम्मान होता है। परंतु जब गुणों का कोई कद्रदान न हो तो वही गुण कौड़ी के मोल चले जाते हैं। यह दोहा बताता है कि गुणों का मूल्य उन्हें पहचानने वाले पर निर्भर करता है।
कबीर कहते हैं कि कस्तूरी मृग की अपनी नाभि में बसती है, फिर भी वह उसे वन में ढूँढता फिरता है। ठीक इसी प्रकार राम (ईश्वर) हर हृदय में विद्यमान हैं, परंतु संसार उन्हें अपने भीतर देख नहीं पाता। यह दोहा आत्मा में ही परमात्मा के वास का बोध कराता है।
कबीर विनम्रता से कहते हैं कि हे पिता रूप प्रभु! मुझ दीन के सारे अवगुण क्षमा कर दें। हे साधु भाइयो! सुनो—मैं तो बस हरि के चरणों में ही शरण लिए बैठा हूँ। यह दोहा दीनता और ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि भक्ति चौगान (पोलो) के खेल की गेंद के समान है, जिसे जो चाहे प्रेम से अपना ले। सच्चे खिलाड़ी (भक्त) तो हर हाल में प्रसन्न रहते हैं—चाहे जीतें या हार जाएँ। यह दोहा निष्काम और आनंदमय भक्ति का भाव दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि यदि मन शांत और शीतल हो जाए तो संसार में कोई शत्रु नहीं रहता। अपने अहंकार को त्याग दो, फिर सभी तुम पर दया और स्नेह करेंगे। यह दोहा मन की शांति और अहंकार-त्याग का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि यदि उस एक परमतत्त्व को नहीं जाना तो बहुत कुछ जान लेने से क्या लाभ? जो उस एक को जान लेता है वह सब कुछ जान लेता है, और जो अनेक (बाहरी ज्ञान) में उलझा रहता है वह सब कुछ खो देता है। यह दोहा एकमात्र ब्रह्म-ज्ञान को सर्वोपरि बताता है।
कबीर कहते हैं कि सोना, सज्जन और साधु-जन सौ बार टूटकर भी फिर जुड़ जाते हैं। परंतु दुर्जन कुम्हार के घड़े के समान होता है जो एक ही चोट में फूट जाता है (और फिर नहीं जुड़ता)। यह दोहा सज्जन और दुर्जन के स्वभाव का अंतर स्पष्ट करता है।
कबीर कहते हैं कि बार-बार नहाने-धोने से क्या लाभ, यदि मन का मैल (विकार) न धुले? जैसे मछली सदा जल में रहती है, फिर भी उसकी गंध नहीं जाती। यह दोहा बाहरी शुद्धि से अधिक मन की आंतरिक शुद्धि पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि मोह की फाँसी गले में पड़ी है, फिर भी मूर्ख मनुष्य सचेत नहीं हो पाता। एक राम के अतिरिक्त और कोई सच्चा सहारा नहीं है, परंतु जड़बुद्धि इस सत्य को नहीं जान पाता। यह दोहा मोह के बंधन और एकमात्र प्रभु-शरण के महत्व को बताता है।
कबीर कहते हैं कि तू केवल पुस्तकों में लिखी बातों के आधार पर बोलता है, जबकि मैं अपनी आँखों से देखे (स्वयं अनुभव किए) सत्य की बात करता हूँ। मैं तो उलझन सुलझाने वाली बात कहता हूँ, पर तू उसे और उलझाए रखता है। यह दोहा पुस्तकीय ज्ञान पर आत्मानुभव की श्रेष्ठता बताता है।
कबीर कहते हैं कि घर में रहकर भी सच्चे भाव से प्रभु को भजे वही असली भक्त है, जबकि केवल बाहर साधु का वेश धारण कर लेना दिखावा मात्र है। यदि मन माया के पीछे भागता रहे तो वेश बदलने से कोई साधु नहीं बन जाता। यह दोहा बाहरी वेश से अधिक मन की वृत्ति को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि गुरु की आज्ञा के अनुसार ही आना-जाना (हर कार्य) करना चाहिए। सच्चा संत वही है जो गुरु की कठिन से कठिन आज्ञा को भी सहर्ष सहन कर ले। यह दोहा गुरु-आज्ञा के पालन और समर्पण की महत्ता बताता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य जैसा भोजन करता है, उसका मन भी वैसा ही बन जाता है; और जैसा जल (संगति/परिवेश) ग्रहण करता है, उसकी वाणी भी वैसी ही हो जाती है। यह दोहा शुद्ध आहार और सात्विक परिवेश के मन व वाणी पर प्रभाव को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि हे मुल्ला! केवल मस्जिद जाने से क्या, जब तेरे मन में सच्ची आस्था ही नहीं तो तू कैसी नमाज़ पढ़ेगा? तू पाँचों समय नमाज़ तो पढ़ेगा, पर उसमें हर पल हृदय (सच्चा भाव) उपस्थित नहीं रहता। यह दोहा बाहरी कर्मकांड के बजाय हृदय की सच्ची भक्ति पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि न कहीं सच्चा गुरु मिला और न सच्चा शिष्य; दोनों ही (योग्य) पक्ष दूर हो गए। ऐसे में कबीर के मन में जो गूढ़ अनुभूति है, उसे अब किसे बताएँ? यह दोहा सच्चे ज्ञान के पात्रों की दुर्लभता पर खेद व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि जहाँ अहंकार ('आप') है वहाँ विपत्ति है और जहाँ संशय है वहाँ (मन का) रोग है। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि मनुष्य ने स्वयं को ईश्वर से नहीं जोड़ा। यह दोहा अहंकार व संशय के दुष्परिणाम और प्रभु-योग की आवश्यकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि यह जीवन रूपी नाव जर्जर है और (अयोग्य) खेवनहार भी दोषपूर्ण है। जो मन से हलके (मोह-रहित) थे, वे सहज ही पार उतर गए, परंतु जिनके मन पर मोह-अहंकार का भारी बोझ था, वे डूब गए। यह दोहा मन को हलका (निर्मोही) रखकर भवसागर पार करने की सीख देता है।
कबीर कहते हैं कि (अनियंत्रित) आशा ईंधन की तरह जलती रहती है और चिंता उसे और दहकाती है। जो इन दोनों पर विवेक से नियंत्रण रखे, वही धर्म के मार्ग पर चलता है। यह दोहा अतृप्त आशा और चिंता से बचकर संयमित जीवन जीने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जैसे घास खाए बिना घोड़ा एक कदम भी नहीं चल पाता, वैसे ही भूखे पेट भजन-साधना भी नहीं हो पाती। इसलिए पहले रोटी खाकर शरीर की आवश्यकता पूरी करो, फिर निश्चिंत होकर प्रभु का भजन करो। यह दोहा संतुलित और व्यावहारिक साधना का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जब तक मन में काम, क्रोध, मद (अहंकार) और लोभ की खान (भंडार) भरी है, तब तक साधना सिद्ध नहीं होती। वे संतों को सावधान करते हैं कि इन विकारों से सदा सतर्क रहो। यह दोहा मन के प्रमुख विकारों से बचने की चेतावनी देता है।
कबीर कहते हैं कि ज्ञान के बिना सारा संसार भटकता रहता है, इसलिए हे मन! तू रात-दिन सचेत रह। हे साधु भाइयो! सुनो—हरि-नाम के स्मरण से ही सौभाग्य (कल्याण) प्राप्त होता है। यह दोहा ज्ञान और हरि-नाम को जीवन का आधार बताता है।
कबीर कहते हैं कि बकरी तो केवल पत्ते खाती है, फिर भी उसकी खाल खींची जाती है। फिर जो मनुष्य ऊपर से तो राम-राम कहता है पर भीतर कुटिलता और कठोरता से भरा है, उसकी क्या दशा होगी? यह दोहा बाहरी दिखावे और भीतरी कपट के अंतर पर चेतावनी देता है।
कबीर कहते हैं कि हर कोई अपनी-अपनी इच्छा रखता है और अपनी-अपनी बात बोलता है। परंतु जो सच्चे मन से ईश्वर को चाहते हैं, वे उसके लिए कोई भी मूल्य (समर्पण) चुकाने को तैयार रहते हैं। यह दोहा सच्ची ईश्वर-चाह के लिए पूर्ण समर्पण की भावना दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि शरीर की साधना से बढ़कर मन की साधना है—असली बात तब है जब मन ही योगी (साधक) बन जाए। जो इस मन की साधना को प्राप्त कर लेता है, वही सच्चा साधु होता है। यह दोहा बाहरी योग की जगह मन की साधना पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि हृदय के मर्म (सच्चे भाव) को जाने बिना मनुष्य चाहे जितना भी नाम-जप कर ले, वह व्यर्थ है। हे भाई! सुनो—भीतरी सच्चाई और भाव के बिना कोई भी साधना सफल नहीं होती। यह दोहा बाहरी जप से अधिक हृदय के सच्चे भाव को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि मन स्वयं को राजा समझकर बैठा है और अपनी बुद्धि को असीम मानता है (अहंकार में डूबा है)। पर वे कहते हैं कि हे साधु! गुरु के बिना तो केवल अज्ञान का अंधकार ही है। यह दोहा मन के अहंकार पर चोट करते हुए गुरु की आवश्यकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि जहाँ काम (विषय-वासना) है वहाँ ईश्वर का नाम नहीं ठहरता, और जहाँ नाम है वहाँ काम नहीं रहता। यदि कोई इन दोनों को एक साथ रखने का दावा करे तो वह अज्ञान का घर है। यह दोहा वासना और भक्ति के परस्पर विरोध को स्पष्ट करता है।
कबीर कहते हैं कि केवल पत्थर पूजने और तीर्थों में घूमने से क्या प्राप्त होता है? हे भाई! सच्ची भक्ति तो यह है कि पहले अपने मन का मैल (विकार) मिटाओ। यह दोहा बाहरी कर्मकांड के बजाय मन की शुद्धि पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि सोच-विचारकर बोलना चाहिए और समझकर ही कोई बात लिखनी चाहिए। यदि मनुष्य अपने मन को संयम में रखे तो मन को सच्चा आनंद प्राप्त होता है। यह दोहा संयमित वाणी और मन के नियंत्रण का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि पाप से पाप नहीं कटता और एक पाप से दूसरा पाप नहीं मिटता। पापों का संताप तो केवल राम-नाम के जप से ही दूर होता है। यह दोहा प्रायश्चित और पाप-मुक्ति के लिए हरि-नाम को एकमात्र उपाय बताता है।
कबीर कहते हैं कि जो कुछ तुम मुख से बोलते हो, उसे अपने मन में भी उतारो (आचरण में लाओ)। और जो सच्चा भाव मन में है, उसे प्रेमपूर्वक मुख से कहो। यह दोहा वाणी और आचरण में एकरूपता तथा निष्कपटता का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि हे भाई! देखो, ज्ञान की लहर आई है—अब ज्ञान और विवेक का चिंतन जाग्रत करो। हे साधु भाइयो! सुनो—सच्चे ज्ञान से ही जीव का उद्धार (मुक्ति) होता है। यह दोहा आत्मज्ञान को मुक्ति का साधन बताता है।
कबीर कहते हैं कि जब मन राम (ईश्वर) से जुड़ जाता है, तब मनुष्य को सभी सुख स्वतः प्राप्त हो जाते हैं। हे साधु भाइयो! सुनो—अपने मन को राम में लगा दो। यह दोहा मन को ईश्वर में लगाकर परम सुख पाने का संदेश देता है।