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16 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
कबीर के अनुसार प्रेम के ढाई अक्षर ही सबसे बड़ा ज्ञान हैं। प्रेम पर आधारित ये दोहे निःस्वार्थ प्रेम, समर्पण और ईश्वर-प्रेम की गहराई को व्यक्त करते हैं। नीचे प्रेम पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित पढ़ें।
कबीर कहते हैं कि बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ते-पढ़ते सारा संसार समाप्त हो गया, फिर भी कोई सच्चा ज्ञानी न बन सका। असली पंडित (ज्ञानी) वही है जो प्रेम के ढाई अक्षर को पढ़ और समझ ले। तात्पर्य यह है कि पुस्तकीय ज्ञान से बढ़कर प्रेम और मानवता का व्यावहारिक ज्ञान है।
कबीर कहते हैं कि जब तक मुझमें 'मैं' अर्थात अहंकार था, तब तक ईश्वर नहीं मिले; और अब जब ईश्वर मिल गए तो 'मैं' नहीं रहा। प्रेम की गली बहुत सँकरी है, उसमें अहंकार और ईश्वर दोनों एक साथ नहीं समा सकते। ईश्वर-प्राप्ति के लिए अहंकार का त्याग आवश्यक है।
कबीर कहते हैं कि प्रेम न तो खेत में उगाया जा सकता है और न ही बाज़ार में बिकता है। राजा हो या प्रजा, जिसे भी सच्चा प्रेम चाहिए उसे अपना सिर (अहंकार) न्योछावर करके ही इसे पाना पड़ता है। प्रेम पाने के लिए पूर्ण समर्पण आवश्यक है।
कबीर कहते हैं कि जो व्यक्ति तुम्हारे मार्ग में काँटे बोए, तुम उसके लिए फूल बोना। ऐसा करने से तुम्हें तो फूल ही फूल मिलेंगे, परंतु उसके हिस्से त्रिशूल समान कष्ट आएँगे। यह दोहा बुराई के बदले भलाई करने की उदात्त शिक्षा देता है।
कबीर कहते हैं कि प्रेम का बादल आकर मुझ पर बरस गया, जिससे मेरी अंतरात्मा भीतर तक भीग गई। अब वही भीगी हुई आत्मा ईश्वर से मिलने जा रही है। यह दोहा भक्ति-प्रेम में डूबकर ईश्वर-मिलन की अवस्था को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि जो भक्त राम-नाम के रस में भीग जाता है, उसका वह प्रेम-रस कभी सूखता नहीं। उस अनुभूति और भाव को शब्दों में दिखाया नहीं जा सकता; वह तो अकथनीय कहानी है। यह दोहा भक्ति-अनुभव की अवर्णनीय गहराई को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि जिस हृदय में प्रेम का संचार नहीं होता, उसे निष्प्राण ही समझो। वह लोहार की धौंकनी के समान है जो साँस तो लेती है, परंतु जिसमें जीवन नहीं होता। यह दोहा प्रेमरहित जीवन को निरर्थक बताता है।
कबीर कहते हैं कि रात्रि में जितने तारे होते हैं, उतने ही आँसू (ईश्वर-वियोग में) मेरी आँखों से बहे हैं। रोते-रोते आँखें धुँधली हो गईं—राम से इस शरीर का मिलन कितना दुर्लभ है। यह दोहा प्रभु-विरह की तीव्र व्याकुलता को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि प्रेम का बगुला उठा और एक तिनके को आकाश तक ले गया; अंततः तिनका तिनके से जा मिला और अपने मूल स्वभाव से अलग नहीं हुआ। यह दोहा इस सत्य की ओर संकेत करता है कि आत्मा अंततः अपने उद्गम (परमात्मा) में ही जा मिलती है।
कबीर कहते हैं कि केवल पढ़-पढ़कर मनुष्य पत्थर जैसा कठोर और लिख-लिखकर ईंट जैसा जड़ हो गया। हे मनुष्य! ऐसी विद्या पढ़ने से क्या लाभ, यदि तेरे मन में मिठास (कोमलता और प्रेम) न आई? यह दोहा शुष्क पुस्तकीय ज्ञान के बजाय हृदय की कोमलता पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि हरि-नाम के रस को सच्चे अर्थों में तभी पीया हुआ जानो जब उसका नशा (आनंद) कभी न उतरे। ऐसे प्रेमरस के बिना काँटों भरे इस संसार-सागर से कोई कैसे पार उतर सकता है? यह दोहा अखंड भक्ति-रस की महत्ता बताता है।
कबीर कहते हैं कि जिसने प्रेम (ईश्वर-प्रेम) का स्वाद नहीं चखा और उसके सार को नहीं पहचाना, उसका जीवन सूने घर के अतिथि जैसा है जो जैसे आया वैसे ही खाली लौट जाता है। यह दोहा प्रेम और भक्ति के बिना जीवन को निरर्थक बताता है।
कबीर कहते हैं कि प्रेम (नेह) न तो बगिया में उगता है और न बाज़ार में बिकता है। राजा हो या प्रजा, जिसे भी सच्चा प्रेम चाहिए उसे अपना सिर (अहंकार) उठाकर न्योछावर करना ही पड़ता है। यह दोहा सच्चे प्रेम के लिए पूर्ण समर्पण की आवश्यकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि हर कोई अपनी-अपनी इच्छा रखता है और अपनी-अपनी बात बोलता है। परंतु जो सच्चे मन से ईश्वर को चाहते हैं, वे उसके लिए कोई भी मूल्य (समर्पण) चुकाने को तैयार रहते हैं। यह दोहा सच्ची ईश्वर-चाह के लिए पूर्ण समर्पण की भावना दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि सच्ची प्रीति केवल एक राम (ईश्वर) से करनी चाहिए, शेष सब (सांसारिक प्रेम) निरर्थक है। जब तक मनुष्य माया के नशे में डूबा रहेगा, तब तक उसे राम कभी नहीं मिलेंगे। यह दोहा माया-मोह त्यागकर एकनिष्ठ ईश्वर-प्रेम का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जब मन राम (ईश्वर) से जुड़ जाता है, तब मनुष्य को सभी सुख स्वतः प्राप्त हो जाते हैं। हे साधु भाइयो! सुनो—अपने मन को राम में लगा दो। यह दोहा मन को ईश्वर में लगाकर परम सुख पाने का संदेश देता है।