ॐ
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कबीर कहते हैं कि हे मुल्ला! केवल मस्जिद जाने से क्या, जब तेरे मन में सच्ची आस्था ही नहीं तो तू कैसी नमाज़ पढ़ेगा? तू पाँचों समय नमाज़ तो पढ़ेगा, पर उसमें हर पल हृदय (सच्चा भाव) उपस्थित नहीं रहता। यह दोहा बाहरी कर्मकांड के बजाय हृदय की सच्ची भक्ति पर बल देता है।