भक्तिमाला ऐप
🔔 रिमाइंडर · 🪔 आरती · 📿 पंचांग

13 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
कबीर दास समाज सुधारक थे जिन्होंने जाति-पाँति, पाखंड और धार्मिक आडंबर का खुलकर विरोध किया। ये दोहे समानता, मानवता और सच्चे धर्म का संदेश देते हैं। पढ़िए समाज व जाति पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित।
कबीर कहते हैं कि किसी साधु या सज्जन की जाति मत पूछो, बल्कि उसके ज्ञान और गुणों को परखो। जैसे तलवार का मोल उसकी धार से होता है, म्यान (खोल) से नहीं। यह दोहा जाति-पाँति के भेदभाव को नकारकर व्यक्ति के गुणों को महत्व देने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि यदि पत्थर पूजने से ईश्वर मिलते तो मैं तो पूरा पहाड़ ही पूज लेता। इससे तो चक्की का पत्थर भला है जो अनाज पीसकर संसार का पेट भरता है। यह दोहा बाहरी मूर्तिपूजा के आडंबर पर प्रश्न उठाकर सच्ची भक्ति की ओर संकेत करता है।
कबीर कहते हैं कि मिट्टी तो एक ही है, पर उससे अनेक प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती हैं—घड़ा, सुराही, प्याला आदि अनेक नाम पा लेती हैं। इसी प्रकार सभी जीवों में एक ही परमात्मा का अंश है, भेद केवल नाम-रूप का है। यह दोहा ईश्वर की एकता और समानता का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि हे बंदे! तू मुझे कहाँ ढूँढता है, मैं तो तेरे ही पास (भीतर) हूँ। मैं न मंदिर में हूँ, न मस्जिद में, न काबा में और न कैलास में। यह दोहा ईश्वर को बाहरी स्थानों में नहीं, बल्कि अपने भीतर खोजने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि मैं न तो पूजा में हूँ, न नमाज़ में और न किसी अन्य धार्मिक कर्मकांड में। न मैं किसी दिशा-विशेष में हूँ, न लाहौर में और न हिंदू तीर्थस्थलों में। यह दोहा बताता है कि ईश्वर बाहरी आडंबरों में नहीं, सच्चे हृदय में बसता है।
कबीर कहते हैं कि ऊँचे कुल में जन्म लेने मात्र से कोई श्रेष्ठ नहीं हो जाता, यदि उसके कर्म ऊँचे न हों। जैसे सोने के कलश में भरी मदिरा की संत निंदा ही करते हैं। यह दोहा कुल से अधिक कर्म को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि अपने बुरे कर्मों के कारण ही हंस रूपी आत्मा बंधनों में जकड़ जाती है। यदि मनुष्य अपने वास्तविक धर्म और कर्तव्य पर विचार करे तो वह क्यों बंधन में पड़े? यह दोहा कर्म और सच्चे धर्म-विवेक पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि साधु की जाति मत पूछो, बल्कि अपने कर्मों को देखो। राम-नाम के स्मरण रूपी कर्म ही संसार-सागर से पार उतारने वाली नौका है। यह दोहा जाति-भेद से ऊपर उठकर सत्कर्म और भक्ति को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि हे मुल्ला! केवल मस्जिद जाने से क्या, जब तेरे मन में सच्ची आस्था ही नहीं तो तू कैसी नमाज़ पढ़ेगा? तू पाँचों समय नमाज़ तो पढ़ेगा, पर उसमें हर पल हृदय (सच्चा भाव) उपस्थित नहीं रहता। यह दोहा बाहरी कर्मकांड के बजाय हृदय की सच्ची भक्ति पर बल देता है।
कबीर कहते हैं कि ऊँचे कुल में जन्म लेने मात्र से कोई श्रेष्ठ नहीं हो जाता, यदि उसके कर्म ऊँचे न हों। जैसे बाँस ऊँचा तो होता है, परंतु उसमें (चंदन जैसी) सुगंध कहाँ होती है? यह दोहा कुल से अधिक सत्कर्म को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि हिंदू और मुसलमान दोनों को एक ही करता (ईश्वर) ने रचा है। भले ही दोनों अलग-अलग राहों पर चलते हों, पर अंततः उनका घर और द्वार (परमात्मा) एक ही है। यह दोहा धार्मिक एकता और ईश्वर के एकत्व का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि राम और रहीम एक ही हैं, बस उन्हें दो अलग नाम दे दिए गए हैं। जो इस सत्य को समझ लेता है, वही सच्चा साधु है। यह दोहा ईश्वर के एकत्व और साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि केवल पत्थर पूजने और तीर्थों में घूमने से क्या प्राप्त होता है? हे भाई! सच्ची भक्ति तो यह है कि पहले अपने मन का मैल (विकार) मिटाओ। यह दोहा बाहरी कर्मकांड के बजाय मन की शुद्धि पर बल देता है।