ॐ
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कबीर कहते हैं कि जिसने प्रेम (ईश्वर-प्रेम) का स्वाद नहीं चखा और उसके सार को नहीं पहचाना, उसका जीवन सूने घर के अतिथि जैसा है जो जैसे आया वैसे ही खाली लौट जाता है। यह दोहा प्रेम और भक्ति के बिना जीवन को निरर्थक बताता है।