ॐ
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कबीर कहते हैं कि शरीर पक्षी के समान हो गया है—मन जहाँ जाता है, वह वहीं उड़ जाता है। मनुष्य जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। यह दोहा मन की चंचलता और संगति के परिणाम दोनों पर प्रकाश डालता है।