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20 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
कबीर दास ने सत्संग और संतों की संगति को जीवन का सबसे बड़ा सुख बताया है। ये दोहे अच्छी संगति के प्रभाव और सच्चे संत की पहचान का बोध कराते हैं। पढ़िए संत व सत्संग पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित।
कबीर कहते हैं कि किसी साधु या सज्जन की जाति मत पूछो, बल्कि उसके ज्ञान और गुणों को परखो। जैसे तलवार का मोल उसकी धार से होता है, म्यान (खोल) से नहीं। यह दोहा जाति-पाँति के भेदभाव को नकारकर व्यक्ति के गुणों को महत्व देने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि वे संसार रूपी बाज़ार में खड़े होकर सभी के कल्याण की कामना करते हैं। उनका न तो किसी से विशेष मित्रता का स्वार्थ है और न किसी से बैर। यह दोहा निष्पक्षता, समभाव और सबके प्रति सद्भावना का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि बाज़ार में पड़ा हीरा धूल से लिपटा रहता है और साधारण लोग उसका मोल नहीं पहचानते। परंतु जब जौहरी आता है तो वह उसकी असली कीमत पहचान लेता है। यह दोहा बताता है कि गुणी और ज्ञानी व्यक्ति की पहचान केवल पारखी ही कर पाता है।
कबीर कहते हैं कि संत यही उपदेश देते हैं कि संतोष रखो और जो रूखा-सूखा मिल जाए उसी में संतुष्ट रहो। जो श्रेष्ठ कर्म (खेती) करता है, वह सबके साथ मिल-बाँटकर खाता है। यह दोहा संतोष और परोपकार के भाव का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि चंदन के पास उगने वाले वृक्ष भी उसकी सुगंध पा लेते हैं। परंतु जो जड़ी-बूटियाँ या लोग सत्संग का सान्निध्य नहीं अपनाते, वे गुणहीन ही रह जाते हैं। यह दोहा अच्छी संगति के प्रभाव को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि अच्छी संगति से सुख मिलता है और बुरी संगति से दुख। इसलिए यदि अपना कल्याण चाहते हो तो सदैव साधु-संतों की संगति करो। यह दोहा जीवन में संगति के महत्व को रेखांकित करता है।
कबीर कहते हैं कि साधु की संगति गंधी (इत्र बेचने वाले) के पास बैठने जैसी है। वह कुछ न भी दे, तब भी उसकी सुगंध तो साथ आ ही जाती है। यह दोहा सत्संग के अनिवार्य शुभ प्रभाव को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि सच्चा साधु भक्ति-भाव का भूखा होता है, धन का नहीं। जो धन के लोभ में भटकता फिरता है, वह वास्तव में साधु है ही नहीं। यह दोहा सच्चे संत की पहचान बताता है।
कबीर कहते हैं कि शरीर पक्षी के समान हो गया है—मन जहाँ जाता है, वह वहीं उड़ जाता है। मनुष्य जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। यह दोहा मन की चंचलता और संगति के परिणाम दोनों पर प्रकाश डालता है।
कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहरें मोती तट पर ले आती हैं, परंतु बगुला उन्हें परखना नहीं जानता, जबकि हंस केवल श्रेष्ठ (मोती) ही चुनता है। यह दोहा बताता है कि विवेकी व्यक्ति ही सार-असार का भेद पहचानकर श्रेष्ठ को ग्रहण करता है।
कबीर कहते हैं कि जीवित अवस्था में मुझे ऐसा कोई नहीं मिला जिसके सान्निध्य से मैं स्वयं को बड़ा अनुभव करूँ। हे साधु भाइयो! सुनो—जो सच्चे रूप में (परमतत्त्व को) देख लेता है, वही श्रेष्ठ है। यह दोहा सच्चे आत्मदर्शन को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि सच्चा संत अपनी संतता नहीं छोड़ता, चाहे करोड़ों दुर्जन उसे मिल जाएँ। जैसे चंदन काटे जाने पर भी अपनी शीतलता और सुगंध नहीं छोड़ता। यह दोहा सज्जन की दृढ़ सद्प्रकृति को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि वृक्ष कभी अपना फल स्वयं नहीं खाता और नदी अपना जल स्वयं नहीं पीती। इसी प्रकार सच्चा संत भी केवल दूसरों के कल्याण के लिए जीता है। यह दोहा परोपकार और निःस्वार्थ सेवा का आदर्श प्रस्तुत करता है।
कबीर कहते हैं कि जब राम ने (मृत्यु रूपी) बुलावा भेजा तो वे रो पड़े, क्योंकि साधु-संतों की संगति में जो सुख मिलता है वह तो बैकुंठ (स्वर्ग) में भी नहीं है। यह दोहा सत्संग के अनुपम आनंद को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ बताता है।
कबीर कहते हैं कि साधु तो अतिथि बनकर (ज्ञान बाँटने) आया, परंतु मूर्ख मनुष्य उल्टा उसे ही उपदेश देने लगा—यह विपरीत बुद्धि उसकी समझ में नहीं आई। यह दोहा अहंकारवश ज्ञानी का मूल्य न पहचानने वाले की मूर्खता पर व्यंग्य करता है।
कबीर कहते हैं कि संतों के सान्निध्य से संसार में ज्ञान का उजाला फैलता है और उनके चले जाने पर अज्ञान का अंधकार छा जाता है। जिस घर में साधु-संतों का आदर नहीं होता, उस घर पर हज़ार धिक्कार है। यह दोहा संत-सान्निध्य और उनके सम्मान का महत्व बताता है।
कबीर कहते हैं कि कच्चा फल हरा (अपरिपक्व) ही रहता है और बहुत से जीव बिना परिपक्व (आत्मज्ञान को प्राप्त) हुए ही मर जाते हैं। परंतु सच्चा साधु ऐसा होता है जो लाखों लोगों को (भवसागर से) तार देता है। यह दोहा सच्चे संत की उद्धारक शक्ति को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि संसार में एक जीव दूसरे जीव को खाता है, परंतु सच्चा संत मांस नहीं खाता (किसी जीव की हिंसा नहीं करता)। हे जीव! तू अहिंसक होकर जी और राम के समीप रहकर अपने भाव को सींच। यह दोहा अहिंसा और प्रभु-सान्निध्य का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि इस संसार में जो व्यक्ति सच्चे संत की शरण ले लेता है, वह उन भक्तजनों के सहारे भवसागर के पार पहुँच जाता है। यह दोहा संत-शरण को मुक्ति का साधन बताता है।
कबीर कहते हैं कि सद्गुरु का सान्निध्य प्राप्त है, इसलिए प्रतिदिन सत्संग करना चाहिए। हे भाई! सुनो—इस नित्य सत्संग से ही मन सांसारिक बंधनों से मुक्त (अतीत) हो जाता है। यह दोहा नियमित सत्संग के महत्व को रेखांकित करता है।