ॐ
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कबीर कहते हैं कि मैं न तो पूजा में हूँ, न नमाज़ में और न किसी अन्य धार्मिक कर्मकांड में। न मैं किसी दिशा-विशेष में हूँ, न लाहौर में और न हिंदू तीर्थस्थलों में। यह दोहा बताता है कि ईश्वर बाहरी आडंबरों में नहीं, सच्चे हृदय में बसता है।