ॐ
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कबीर कहते हैं कि जैसे प्राण के बिना देह व्यर्थ है, वैसे ही राम (ईश्वर) के बिना यह शरीर निरर्थक है। जब मन का मोह छूट जाता है तो जीव संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है। यह दोहा ईश्वर-स्मरण को जीवन का सार बताता है।