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29 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
कबीर दास ने माया को छाया के समान बताया है, जो भक्त को भ्रमित करती है। माया और मोह पर आधारित ये दोहे सांसारिक आकर्षण के मिथ्यापन का बोध कराते हैं। पढ़िए माया पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित।
कबीर कहते हैं कि मिट्टी कुम्हार से कहती है कि तू मुझे क्या रौंदता है? एक दिन ऐसा भी आएगा जब मैं तुझे (तेरे शव को अपने भीतर समाकर) रौंदूँगी। यह दोहा मनुष्य के अहंकार पर चोट करते हुए मृत्यु की अनिवार्यता और नश्वरता का स्मरण कराता है।
कबीर कहते हैं कि जिसकी सारी इच्छाएँ मिट गईं, चिंताएँ समाप्त हो गईं और मन निश्चिंत हो गया, वही सच्चा सुखी है। जिसे संसार से कुछ नहीं चाहिए, वही वास्तव में बादशाहों का बादशाह है। यह दोहा निःस्पृहता और संतोष को सबसे बड़ा धन बताता है।
कबीर कहते हैं कि जो उदय हुआ है वह अस्त होगा, जो खिला है वह मुरझाएगा, जो बना है वह ढह जाएगा और जो इस संसार में आया है वह एक दिन अवश्य जाएगा। यह दोहा संसार की नश्वरता और अनित्यता का गहरा सत्य प्रकट करता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य को वही धन संचित करना चाहिए जो आगे (परलोक) में काम आए, अर्थात पुण्य और भक्ति का धन। सिर पर गठरी (सांसारिक धन) रखकर इस संसार से जाते हुए किसी को नहीं देखा गया। यह दोहा सांसारिक संग्रह की निरर्थकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब कोई किसी का नहीं रहेगा। मृत्यु के समय घर के लोग शरीर रूपी संगिनी (आत्मा) से कह देंगे कि अब यहाँ से चली जाओ। यह दोहा सांसारिक संबंधों की नश्वरता का स्मरण कराता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है। जैसे प्रातःकाल होते ही तारा छिप जाता है, वैसे ही यह शरीर भी एक दिन समाप्त हो जाएगा। यह दोहा जीवन की नश्वरता का गहरा बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि यह शरीर एक दिन चला जाएगा, इसलिए जब तक संभव है इसका सदुपयोग (भक्ति) कर लो। जिनके पास लाखों-करोड़ों की संपत्ति थी, वे भी खाली हाथ ही इस संसार से गए। यह दोहा धन-संग्रह की निरर्थकता बताता है।
कबीर कहते हैं कि माया मीठी खांड (शक्कर) की तरह मन को मोह लेने वाली है। इसलिए भक्ति में स्थिर रहकर चंचल मन को संयम की डोर से बाँध लेना चाहिए। यह दोहा माया के आकर्षण से बचकर भक्ति में दृढ़ता का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि माया और छाया एक जैसी होती हैं, इस रहस्य को बिरला ही समझ पाता है। यह माया भागते हुए भक्त के पीछे-पीछे दौड़ती है, परंतु जो साहसपूर्वक इसका सामना करता है, उससे यह स्वयं दूर भाग जाती है। तात्पर्य यह कि माया से डरकर भागने के बजाय निर्भय होकर उसका सामना करना चाहिए।
कबीर कहते हैं कि सच्चा साधु भक्ति-भाव का भूखा होता है, धन का नहीं। जो धन के लोभ में भटकता फिरता है, वह वास्तव में साधु है ही नहीं। यह दोहा सच्चे संत की पहचान बताता है।
कबीर कहते हैं कि जैसे प्राण के बिना देह व्यर्थ है, वैसे ही राम (ईश्वर) के बिना यह शरीर निरर्थक है। जब मन का मोह छूट जाता है तो जीव संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है। यह दोहा ईश्वर-स्मरण को जीवन का सार बताता है।
कबीर कहते हैं कि ऐसा कोई बिरला ही मिलता है जो सच्ची आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान कर दे। उस दृष्टि के मिलते ही सब कुछ (परमतत्त्व) प्राप्त हो जाता है, परंतु माया मनुष्य को भ्रमित कर सत्य से विमुख रखती है। यह दोहा सद्गुरु की दृष्टि के महत्व को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि न माया मरी और न मन मरा, केवल शरीर बार-बार मरते रहे (जन्म-मरण होता रहा)। आशा और तृष्णा कभी समाप्त नहीं हुईं—ऐसा दास कबीर कह गए हैं। यह दोहा अंतहीन इच्छाओं और तृष्णा के बंधन को उजागर करता है।
कबीर कहते हैं कि हरि-नाम के रस को सच्चे अर्थों में तभी पीया हुआ जानो जब उसका नशा (आनंद) कभी न उतरे। ऐसे प्रेमरस के बिना काँटों भरे इस संसार-सागर से कोई कैसे पार उतर सकता है? यह दोहा अखंड भक्ति-रस की महत्ता बताता है।
कबीर कहते हैं कि चलती हुई चक्की को देखकर वे रो पड़े, क्योंकि उसके दो पाटों के बीच कोई दाना साबुत नहीं बचता। इसी प्रकार संसार रूपी चक्की (काल और माया) के बीच कोई जीव नहीं बचता। (संत यह भी कहते हैं कि जो कील रूपी सच्चे आश्रय—प्रभु—से चिपका रहे, वही बचता है।) यह दोहा संसार की नश्वरता का गहन बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि जो कुछ भी है वह सब ईश्वर का है, फिर तू उसे 'मेरा' क्यों कहता है? जब तू स्वयं ही नहीं रहेगा, तब तेरे लिए यह सुबह (सांसारिक वैभव) कहाँ रहेगी? यह दोहा 'मेरेपन' के मिथ्या अहंकार को उजागर करता है।
कबीर कहते हैं कि पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के मेल से यह शरीर बना है और इसी से आशा-तृष्णा उपजती है। जब यह शरीर अंततः मिट्टी में मिल जाएगा तो फिर इसके लिए रोना-धोना किस काम का? यह दोहा शरीर की नश्वरता और तृष्णा के मिथ्यापन को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि मोह की फाँसी गले में पड़ी है, फिर भी मूर्ख मनुष्य सचेत नहीं हो पाता। एक राम के अतिरिक्त और कोई सच्चा सहारा नहीं है, परंतु जड़बुद्धि इस सत्य को नहीं जान पाता। यह दोहा मोह के बंधन और एकमात्र प्रभु-शरण के महत्व को बताता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य झूठे (क्षणिक) सुख को ही सच्चा सुख मानकर मन में प्रसन्न होता है। पर सारा संसार तो काल का चबेना (नाश्ता) है—कुछ उसके मुँह में है और कुछ गोद में रखा है, अर्थात सब क्रमशः काल का ग्रास बनेगा। यह दोहा सांसारिक सुख की क्षणभंगुरता दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि घर में रहकर भी सच्चे भाव से प्रभु को भजे वही असली भक्त है, जबकि केवल बाहर साधु का वेश धारण कर लेना दिखावा मात्र है। यदि मन माया के पीछे भागता रहे तो वेश बदलने से कोई साधु नहीं बन जाता। यह दोहा बाहरी वेश से अधिक मन की वृत्ति को महत्व देता है।
कबीर कहते हैं कि जब तक संसार के मोह-संबंधों से लगाव बना रहता है, तब तक सच्ची भक्ति नहीं हो पाती। जो मोह के बंधन तोड़कर हरि का भजन करता है, वही सच्चा भक्त कहलाता है। यह दोहा भक्ति के लिए मोह-त्याग की आवश्यकता बताता है।
कबीर ईश्वर से कहते हैं कि मुझमें मेरा अपना कुछ भी नहीं, जो कुछ है वह सब तेरा ही है। तेरी ही दी हुई वस्तु तुझे लौटाने में मेरा क्या लगता है? यह दोहा पूर्ण समर्पण और अहंकार-शून्यता की पराकाष्ठा को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि जो भी उत्पन्न होता है वह नष्ट होता ही है—वृक्ष, फूल, फल और पत्ते सभी। रात-दिन काल निरंतर आगे बढ़ता रहता है (और सबको अपने साथ ले जाता है)—इस सत्य को भली-भाँति समझ लो। यह दोहा संसार की अनित्यता का बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि सब लोग 'मेरा-मेरा' करते रहते हैं, पर सचमुच किसका कौन अपना है? जिसने स्वयं को हरि को समर्पित कर दिया, वही सदा के लिए (अमर रूप में) अपना हो जाता है। यह दोहा सांसारिक 'अपनेपन' की मिथ्या पर ईश्वर-समर्पण की श्रेष्ठता बताता है।
कबीर कहते हैं कि यह जीवन रूपी नाव जर्जर है और (अयोग्य) खेवनहार भी दोषपूर्ण है। जो मन से हलके (मोह-रहित) थे, वे सहज ही पार उतर गए, परंतु जिनके मन पर मोह-अहंकार का भारी बोझ था, वे डूब गए। यह दोहा मन को हलका (निर्मोही) रखकर भवसागर पार करने की सीख देता है।
कबीर कहते हैं कि जीवन बहुत छोटा है, फिर तू किस बात का अहंकार करता है? तू खाली हाथ इस संसार में आया था और खाली हाथ ही जाएगा—फिर तेरी यह शान किस काम की? यह दोहा जीवन की क्षणभंगुरता और अहंकार की निरर्थकता दर्शाता है।
कबीर प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! संसार को भले ही सांसारिक भोग-वस्तुएँ दें, परंतु मुझे तो ब्रह्म-ज्ञान दें। लोग संसार के धोखे (मोह) में ही पड़े रहते हैं और इसी में सारा जीवन-संसार बीत जाता है। यह दोहा सांसारिक मोह से ऊपर ब्रह्म-ज्ञान की कामना व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि सच्ची प्रीति केवल एक राम (ईश्वर) से करनी चाहिए, शेष सब (सांसारिक प्रेम) निरर्थक है। जब तक मनुष्य माया के नशे में डूबा रहेगा, तब तक उसे राम कभी नहीं मिलेंगे। यह दोहा माया-मोह त्यागकर एकनिष्ठ ईश्वर-प्रेम का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि इस संसार के सारे व्यवहार (सांसारिक लेन-देन और संबंध) झूठे एवं नश्वर हैं। जो व्यक्ति अपनी जीवन-नौका को राम-नाम के सहारे खेता है, वही भवसागर के पार उतरता है। यह दोहा सांसारिक मिथ्या से ऊपर हरि-नाम के आश्रय को महत्व देता है।