ॐ
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कबीर कहते हैं कि यदि समूची धरती को कागज़, समस्त वनों को कलम और सातों समुद्रों को स्याही बना लूँ, तब भी गुरु के गुणों (महिमा) को लिखकर पूरा नहीं किया जा सकता। यह दोहा गुरु की अपार और अवर्णनीय महिमा को व्यक्त करता है।