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10 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
कबीर दास ने गुरु को ईश्वर से भी बढ़कर माना है, क्योंकि गुरु ही शिष्य को ज्ञान का मार्ग दिखाकर भवसागर पार कराता है। गुरु की महिमा का बखान करते ये दोहे गुरु-शिष्य परंपरा का सार प्रस्तुत करते हैं। पढ़िए गुरु पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित।
कबीर कहते हैं कि जब गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों एक साथ खड़े हों तो पहले किसके चरण छुऊँ? मैं अपने गुरु पर बलिहारी जाता हूँ जिन्होंने मुझे गोविंद तक पहुँचने का मार्ग बताया। इस दोहे में गुरु की महिमा को ईश्वर से भी ऊँचा माना गया है।
कबीर कहते हैं कि यह शरीर विष की बेल के समान है, जबकि गुरु अमृत की खान हैं। यदि अपना सिर देकर भी सच्चा गुरु मिल जाए तो उसे सस्ता ही समझना चाहिए। यह दोहा गुरु की अनमोल महिमा को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि ऐसा कोई बिरला ही मिलता है जो सच्ची आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान कर दे। उस दृष्टि के मिलते ही सब कुछ (परमतत्त्व) प्राप्त हो जाता है, परंतु माया मनुष्य को भ्रमित कर सत्य से विमुख रखती है। यह दोहा सद्गुरु की दृष्टि के महत्व को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि जीवन रूपी नाव भवसागर के बीच फँसी है; गुरु के बिना इसे पार कौन लगाएगा? हे साधु भाइयो! सुनो—गुरु के बिना मन को शांति और सहारा नहीं मिलता। यह दोहा भवसागर पार करने में गुरु की अनिवार्यता बताता है।
कबीर कहते हैं कि गुरु के बिना तू कितना भी खोज ले, सच्चा उत्तर (आत्मज्ञान) नहीं मिलता। हे साधु भाइयो! सुनो—सच्चा गुरु तो कोई बिरला ही होता है। यह दोहा सद्गुरु की दुर्लभता और आवश्यकता दोनों को रेखांकित करता है।
कबीर कहते हैं कि गुरु की आज्ञा के अनुसार ही आना-जाना (हर कार्य) करना चाहिए। सच्चा संत वही है जो गुरु की कठिन से कठिन आज्ञा को भी सहर्ष सहन कर ले। यह दोहा गुरु-आज्ञा के पालन और समर्पण की महत्ता बताता है।
कबीर कहते हैं कि यदि समूची धरती को कागज़, समस्त वनों को कलम और सातों समुद्रों को स्याही बना लूँ, तब भी गुरु के गुणों (महिमा) को लिखकर पूरा नहीं किया जा सकता। यह दोहा गुरु की अपार और अवर्णनीय महिमा को व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि न कहीं सच्चा गुरु मिला और न सच्चा शिष्य; दोनों ही (योग्य) पक्ष दूर हो गए। ऐसे में कबीर के मन में जो गूढ़ अनुभूति है, उसे अब किसे बताएँ? यह दोहा सच्चे ज्ञान के पात्रों की दुर्लभता पर खेद व्यक्त करता है।
कबीर कहते हैं कि सद्गुरु का सान्निध्य प्राप्त है, इसलिए प्रतिदिन सत्संग करना चाहिए। हे भाई! सुनो—इस नित्य सत्संग से ही मन सांसारिक बंधनों से मुक्त (अतीत) हो जाता है। यह दोहा नियमित सत्संग के महत्व को रेखांकित करता है।
कबीर कहते हैं कि मन स्वयं को राजा समझकर बैठा है और अपनी बुद्धि को असीम मानता है (अहंकार में डूबा है)। पर वे कहते हैं कि हे साधु! गुरु के बिना तो केवल अज्ञान का अंधकार ही है। यह दोहा मन के अहंकार पर चोट करते हुए गुरु की आवश्यकता बताता है।