
देव उठनी एकादशी बनाम देवशयनी एकादशी: क्या अंतर है?
देवशयनी और देव उठनी एकादशी पवित्र चातुर्मास की शुरुआत और अंत को चिह्नित करती हैं। दोनों के बारे में सब कुछ जानें।
वर्ष भर की 24 एकादशियों में दो का महत्व सबसे अधिक है: देवशयनी एकादशी और देव उठनी एकादशी। ये दोनों मिलकर चातुर्मास नामक पवित्र चार महीनों की शुरुआत और समापन तय करती हैं। आइए जानें दोनों में क्या अंतर है।
देवशयनी एकादशी (आषाढ़ शुक्ल एकादशी)
देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (जून–जुलाई) को आती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं।
मुख्य महत्व:
- इसी दिन से चातुर्मास आरंभ होता है — चार पवित्र महीने, जिनमें परंपरा से विवाह और नए कार्य आरंभ नहीं किए जाते
- इसे हरिशयनी एकादशी या पद्मा एकादशी भी कहते हैं
- भक्त चातुर्मास के लिए संयम का संकल्प लेते हैं
- 2026 में देवशयनी एकादशी 25 जुलाई 2026 को है — सामान्य से देर से, क्योंकि 2026 में अधिक मास है
देव उठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी)
देव उठनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (अक्टूबर–नवंबर) को आती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं।
मुख्य महत्व:
- इसी दिन चातुर्मास समाप्त होता है — शुभ कार्य, विशेषकर विवाह, फिर से आरंभ होते हैं
- इसे प्रबोधिनी एकादशी या देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं
- इसी दिन या अगले दिन तुलसी विवाह होता है — तुलसी का भगवान विष्णु (शालिग्राम) से विधिवत विवाह
- हिंदू परंपरा में विवाह का मौसम इसी एकादशी से आरंभ होता है
- 2026 में देव उठनी एकादशी 20 नवंबर 2026 को है
मुख्य अंतर एक नज़र में
- देवशयनी: विष्णु शयन करते हैं → चातुर्मास आरंभ → विवाह नहीं
- देव उठनी: विष्णु जागते हैं → चातुर्मास समाप्त → विवाह आरंभ
- दोनों के बीच ठीक चार चंद्र मास का अंतर होता है
दोनों एकादशियाँ विशेष क्यों हैं?
दोनों को महा एकादशी माना जाता है — वर्ष के सबसे फलदायी व्रत दिनों में से। मान्यता है कि इनमें से किसी एक का व्रत रखने से वर्ष की सभी 24 एकादशियों का पुण्य मिलता है। इन दोनों तिथियों पर विष्णु मंदिरों में वर्ष की सबसे बड़ी भीड़ होती है।