युधिष्ठिर ने पूछा — प्रभो! पौष कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? भगवान ने कहा — राजन्! इसका नाम सफला एकादशी है। इस दिन फलों के द्वारा श्रीहरि का पूजन करना चाहिये — नारियल, सुपारी, आँवला, आम और लौंग से। जागरण करनेवाले को हजारों वर्ष की तपस्या का फल मिलता है। "हे हर हे अरे है है हर के हर अर है है जे अर TRI ao i ich ihihick
ब्राह्मणोंका था। वैष्णवों और देवताओंकी भी हमेशा किया
करता था। अपने पुत्रको ऐसा पापाचारी देखकर राजा माहिष्मतने _ राजकुमारोंमें उसका नाम लुम्भक रख दिया। फिर पिता और भाइयोंने मिलकर उसे राज्यसे बाहर निकाल दिया। लुम्भक उस नगरसे निकलकर
गहन SAA चला गया। वहीं रहकर उस पापीने प्रायः समूचे नगरका धन
लूट लिया | एक दिन जब वह चोरी करनेके लिये नगरमें आया तो रातमें
पहरा देनेवाले सिपाहियोंने उसे पकड़ लिया। किन्तु जब उसने अपनेको
राजा माहिष्मतका पुत्र बतलाया तो सिपाहियोंने उसे छोड़ दिया | फिर वह
पापी वनमें लौट आया और प्रतिदिन मांस तथा gales फल खाकर
जीवन-निर्वाह करने लगा। उस दुष्टका विश्राम-स्थान पीपल वृक्षके निकट
था। वहाँ बहुत वर्षोका पुराना पीपलका वृक्ष था | उस SA वह वृक्ष एक
महान् देवता माना जाता था। पापबुद्धि लुम्भक वहीं निवास करता था।
अध्याय 2 — राजकुमार लुम्भक की कथा
बहुत दिनोंके पश्चात् एक दिन किसी संचित पुण्यके प्रभावसे उसके
द्वारा एकादशीके ब्रतका पालन हो गया | पौष मासमें कृष्णपक्षकी दशमीके
दिन पापिष्ठ लुम्भकने वृक्षोंके फल खाये और ASE होनेके कारण रातभर
जाड़ेका कष्ट भोगा। उस समय न तो उसे नींद आयी और न आराम ही
मिला। वह निष्म्राण-सा हो रहा था। सूर्योदय होनेपर भी उस पापीको होश
नहीं हुआ। 'सफला' एकादशीके दिन भी लुम्भक बेहोश पड़ा रहा | दोपहर
होनेपर उसे चेतना EE | फिर इधर-उधर दृष्टि डालकर वह आसनसे
उठा और हैंगड़ेकी भाँति WA बार-बार लड़खड़ाता हुआ वनके भीतर
गया। वह भूखसे दुर्बल और पीड़ित हो रहा था। राजन् ! उस समय
लुम्भक बहुत-से फल लेकर ज्यों ही विश्राम-स्थानपर लौटा, त्यों ही सूर्यदेव
अस्त हो गये। तब उसने वृक्षकी जड़में बहुत-से फल निवेदन करते हुए
कहा---'इन लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु संतुष्ट el यों कहकर
लुम्भकने रातभर नींद नहीं ली | इस प्रकार अनायास ही उसने इस व्रतका
पालन कर लिया। उस समय सहसा आकाशवाणी हुई--रण्जकुमार ! १६ एकादशी-ब्रतका माहात्म्य
तुम 'सफला' एकादशीके प्रसादसे राज्य और पुत्र प्राप्त करोगे ।” “बहुत
अच्छा' कहकर उसने वह वरदान स्वीकार किया | इसके बाद उसका रूप
दिव्य हो गया । तबसे उसकी उत्तम बुद्धि भगवान् विष्णुके भजनमें लग
गयी। दिव्य आभूषणोंकी शोभासे सम्पन्न होकर उसने अकण्टक राज्य प्राप्त
किया और पंद्रह वर्षोत्क वह उसका संचालन करता रहा । उस समय
भगवान् MPO कृपासे उसंके मनोज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ | जब वह
बड़ा हुआ, तब लुम्भकने तुरंत ही राज्यकी ममता छोड़कर उसे पुत्रको सौंप
दिया और वह भगवान् श्रीकृष्णके समीप चला गया, जहाँ जाकर मनुष्य
कभी शोकमें नहीं पड़ता। राजन् ! इस प्रकार जो 'सफला' एकादशीका
उत्तम व्रत करता है, वह इस लोकमें सुख भोगकर मरनेके पश्चात् मोक्षको
प्राप्त होता है। संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो 'सफला' एकादशीके ब्रतमें लगे रहते हैं। उन्हींका जन्म सफल है। महाराज | इसकी महिमाको पढ़ने, सुनने - तथा उसके अनुसार आचरण करनेसे मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है।
ae बोले--श्रीकृष्ण! आपने जशुभकारिणी 'सफला'
एकादशीका वर्णन किया । अब कृपा करके शुक्लपक्षकी एकादशीका महत्त्व
बतलाइये। उसका क्या नाम है ? कौन-सी विधि है ? तथा उसमें किस
देव॒ताका पूजन किया जाता है ?