अध्याय 1 — उत्पन्ना एकादशी की विधि और महिमा
युधिष्ठिर बोले — हे भगवन्! कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात् प्रबोधिनी एकादशी का विस्तार से वर्णन आपने सुनाया। अब मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में भी बताइये। इसका क्या नाम है, इसकी विधि क्या है और इसका व्रत करने से क्या फल मिलता है?
श्रीकृष्ण बोले — मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में आनेवाली इस एकादशी का नाम है — उत्पन्ना एकादशी। इस एकादशी का व्रत करने से शंखोद्धार तीर्थ में स्नान और भगवान के दर्शन के समान पुण्य मिलता है। व्रत करनेवाले को चोर, पाखंडी, परस्त्रीगामी, निंदक, मिथ्याभाषी तथा किसी भी प्रकार के पापी से बातचीत नहीं करनी चाहिये। इसका माहात्म्य ध्यानपूर्वक सुनो।
युधिष्ठिर बोले — भगवन्! आपने हजारों यज्ञ और लाख गौदान को भी एकादशी व्रत के बराबर नहीं बताया। यह तिथि सब तिथियों में सर्वश्रेष्ठ कैसे हुई?
श्रीकृष्ण बोले — सतयुग में मुर नाम का एक दैत्य उत्पन्न हुआ। वह बड़ा बलवान् और भयानक था। उसने इंद्र, आदित्य, वसु, वायु, अग्नि आदि समस्त देवताओं को पराजित कर स्वर्ग से भगा दिया। तब भयभीत देवता भगवान शिव के पास पहुँचे और सारा वृत्तांत कह सुनाया।
भगवान शिव बोले — तीनों लोकों के स्वामी, भक्तों के दुःखनाशक भगवान विष्णु की शरण में जाओ। वे ही तुम्हारी रक्षा कर सकते हैं।
शिवजी का आदेश पाकर सभी देवता क्षीरसागर पहुँचे। भगवान को शयन करते देख हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे — हे देवस्तुत्य प्रभो! आपको बारम्बार नमस्कार है। देवताओं की रक्षा करनेवाले मधुसूदन! आप हमारी रक्षा करें। आप इस सृष्टि के रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। आकाश से पाताल तक सब कुछ आप ही हैं। ब्रह्मा, सूर्य, चंद्र, अग्नि, यज्ञ, मंत्र, जप — सब आप ही हैं। आप सर्वव्यापक हैं।
हे भगवन्! दैत्यों ने हमें स्वर्ग से भ्रष्ट कर दिया है और हम इधर-उधर भटक रहे हैं। उन दैत्यों से हमारी रक्षा कीजिये।