ॐ
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कबीर विनम्रता से कहते हैं कि हे पिता रूप प्रभु! मुझ दीन के सारे अवगुण क्षमा कर दें। हे साधु भाइयो! सुनो—मैं तो बस हरि के चरणों में ही शरण लिए बैठा हूँ। यह दोहा दीनता और ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति को व्यक्त करता है।