ॐ
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कबीर कहते हैं कि जैसे घास खाए बिना घोड़ा एक कदम भी नहीं चल पाता, वैसे ही भूखे पेट भजन-साधना भी नहीं हो पाती। इसलिए पहले रोटी खाकर शरीर की आवश्यकता पूरी करो, फिर निश्चिंत होकर प्रभु का भजन करो। यह दोहा संतुलित और व्यावहारिक साधना का संदेश देता है।