ॐ
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कबीर कहते हैं कि जब तक मन में काम, क्रोध, मद (अहंकार) और लोभ की खान (भंडार) भरी है, तब तक साधना सिद्ध नहीं होती। वे संतों को सावधान करते हैं कि इन विकारों से सदा सतर्क रहो। यह दोहा मन के प्रमुख विकारों से बचने की चेतावनी देता है।