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कबीर कहते हैं कि सच्चा ज्ञानी निर्भय हो जाता है, जबकि अभिमानी केवल हठयोग (बाहरी क्रियाओं) में उलझा रहता है। पर वे कहते हैं कि हरि के भजन के बिना संसार रूपी रोग (जन्म-मरण का चक्र) नहीं मिटता। यह दोहा हठयोग के अभिमान से ऊपर हरि-भजन को महत्व देता है।