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कबीर कहते हैं कि हृदय के मर्म (सच्चे भाव) को जाने बिना मनुष्य चाहे जितना भी नाम-जप कर ले, वह व्यर्थ है। हे भाई! सुनो—भीतरी सच्चाई और भाव के बिना कोई भी साधना सफल नहीं होती। यह दोहा बाहरी जप से अधिक हृदय के सच्चे भाव को महत्व देता है।