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कबीर कहते हैं कि संसार में एक जीव दूसरे जीव को खाता है, परंतु सच्चा संत मांस नहीं खाता (किसी जीव की हिंसा नहीं करता)। हे जीव! तू अहिंसक होकर जी और राम के समीप रहकर अपने भाव को सींच। यह दोहा अहिंसा और प्रभु-सान्निध्य का संदेश देता है।