ॐ
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कबीर कहते हैं कि कहते-सुनते सारे दिन बीत गए, फिर भी मनुष्य न तो सांसारिक उलझनों में पूरी तरह उलझा और न ही उनसे सुलझ पाया। हे मनुष्य! अब सचेत हो जा, आखिर कब तक यूँ ही भटकता रहेगा? यह दोहा आत्मचिंतन और जागृति की प्रेरणा देता है।