ॐ
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कबीर कहते हैं कि अपने बुरे कर्मों के कारण ही हंस रूपी आत्मा बंधनों में जकड़ जाती है। यदि मनुष्य अपने वास्तविक धर्म और कर्तव्य पर विचार करे तो वह क्यों बंधन में पड़े? यह दोहा कर्म और सच्चे धर्म-विवेक पर बल देता है।