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कबीर कहते हैं कि प्रेम (नेह) न तो बगिया में उगता है और न बाज़ार में बिकता है। राजा हो या प्रजा, जिसे भी सच्चा प्रेम चाहिए उसे अपना सिर (अहंकार) उठाकर न्योछावर करना ही पड़ता है। यह दोहा सच्चे प्रेम के लिए पूर्ण समर्पण की आवश्यकता बताता है।