ॐ
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कबीर कहते हैं कि प्रेम का बगुला उठा और एक तिनके को आकाश तक ले गया; अंततः तिनका तिनके से जा मिला और अपने मूल स्वभाव से अलग नहीं हुआ। यह दोहा इस सत्य की ओर संकेत करता है कि आत्मा अंततः अपने उद्गम (परमात्मा) में ही जा मिलती है।