{अथार्गलास्तोत्रम्
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ॐ अस्य ॒श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुऋषि:, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीमहालक्ष्मीदेवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाडुत्वेन जपे विनियोगः ॥
ॐ नमश्चण्डिकायै ॥
मार्कण्डेय उवाच
मार्कण्डेयजी कहते है-जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली,
कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा” और स्वधा९९ इन
जननमरणादिरूपं सर्पणं भक्तानां लाति गृह्णाति नाशयति या सा मङ्गला मोक्षप्रदा-- जो अपने
भक्तोंके जन्म-मरण आदि संसार-बन्धनको दूर करती हैं, उन मोक्षदायिनी मंगलमयी देवीका
नाम "मंगला' है । ३. कलयति भक्षयति प्रलयकाले सर्वम् इति काली- जो प्रलयकालमें
सम्पूर्णं सृष्टिको अपना ग्रास बना लेती है; वह ' काली" है। ४. भद्रं मङ्गलं सुखं वा कलयति
स्वीकरोति भक्तेभ्यो दातुम् इति भद्रकाली सुखप्रदा-- जो अपने भक्तोंको देनेके लिये ही भद्र,
सुख किंवा मंगल स्वीकार करती है, वह ‹ भद्रकाली" है। ५. हाथमे कपाल तथा गलेमें
मुण्डमाला धारण करनेवाली । ६. दुःखेन अष्टाङ्गयोगकर्मोपासनारूपेण क्लेशेन गम्यते प्राप्यते
या सा दुर्गा-जो अष्टांगयोग, कर्म एवं उपासनारूप दुःसाध्य साधनसे प्राप्त होती हैं, वे
जगदम्बिका "दुर्गा" कहलाती हैँ । ७. क्षमते सहते भक्तानाम् अन्येषां वा सर्वानपराधान्
जननीत्वेनातिशयकरुणामयस्वभावादिति क्षमा-- सम्पूर्ण जगत्की जननी होनेसे अत्यन्त करुणामय
स्वभाव होनेके कारण जो भक्तों अथवा दूसरोंके भी सारे अपराध क्षमा करती हैं, उनका नाम
“क्षमा ' है। ८. सबका शिव अर्थात् कल्याण करनेवाली जगदम्बाको 'शिवा' कहते हैँ । ९.सम्पूर्ण
प्रपंचको धारण करनेके कारण भगवतीका नाम ! धात्री ' हे। १०.स्वाहारूपसे यज्ञभाग ग्रहण
करके देवताओंका पोषण करनेवाली । ११.स्वधारूपसे श्राद्ध ओर तर्पणको स्वीकार करके
मधु और कैटभको मारनेवाली तथा ब्रह्याजीको वरदान देनेवाली देवि! तुम्हें
नमस्कार हे। तुम मुझे रूप (आत्मस्वरूपका ज्ञान) दो, जय (मोहपर विजय)
दो, यश (मोह-विजय तथा ज्ञान-प्राप्तिरूप यश) दो ओर काम-क्रोध आदि
शत्रुओंका नाश करो॥३॥ महिषासुरका नाश करनेवाली तथा भक्तोंको सुख
देनेवाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम रूप दो, जय दो, यश दो ओर
काम-क्रोध आदि शत्रुओंका नाश करो॥४॥ रक्तबीजका वध और चण्ड-
मुण्डका विनाश करनेवाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-
क्रोध आदि शत्रुओंका नाश करो॥५॥ शुम्भ और निशुम्भ तथा धूम्रलोचनका
मर्दन करनेवाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध
करो ॥७॥ देवि! तुम्हारे रूप और चरित्र अचिन्त्य हे । तुम समस्त शत्रुओंका
नाश करनेवाली हो। रूप दो, जय दो, यश दो ओर कामक्रोध आदि शत्रुओंका
नाश करो॥ ८ ॥ पापको दूर करनेवाली चण्डिके ! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे चरणोंमें
सर्वदा मस्तक झुकाते हैं, उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो ओर उनके काम-क्रोध
आदि शत्रुओंका नाश करो ॥ ९ ॥ रोगोंका नाश करनेवाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक
तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन्हे रूप दो, जय दो, यश दो ओर उनके काम-क्रोध
आदि शत्रुओंका नाश करो ॥ १० ॥ चण्डिके ! इस संसारमें जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी
पूजा करते हैं, उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और उनके कामक्रोध आदि
शत्रुओंका नाश करो ॥ ११॥ मुझे सौभाग्य ओर आरोग्य दो। परम सुख दो, रूप
जो मुझसे द्वेष रखते हों, उनका नाश और मेरे बलकौ वृद्धि करो। रूप
अम्बिके! देवता ओर असुर दोनों ही अपने माथेके मुकुटकी मणियोंको
तुम्हारे चरणोपर धिसते रहते हैँ । तुम रूप दो, जय दो, यश दो ओर काम क्रोध
आदि शत्रुओंका नाश करो ॥ १५॥ तुम अपने भक्तजनको विद्वान्, यशस्वी और
लक्ष्मीवान् बनाओ तथा रूप दो, जय दो, यश दो ओर उसके कामक्रोध आदि
मुझ शरणागतको रूप दो, जय दो, यश दो और मेरे काम-क्रोध आदि शत्रुओंका
देवि अम्बिके ! भगवान् विष्णु नित्य-निरन्तर भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते
रहते हैं। तुम रूप दो, जय दो, यश दो ओर कामक्रोध आदि शत्रुओंका नाश
करो ॥ १९॥ हिमालय- कन्या पार्वतीके पति महादेवजीके द्वारा प्रशंसित होनेवाली
परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओंका नाश
करो॥ २०॥ शचीपति इन्द्रके द्वारा सद्धावसे पूजित होनेवाली परमेश्वरि ।
तुम रूप दो, जय दो, यश दो ओर काम-क्रोध आदि शत्रुओंका नाश
करो ॥ २१॥ प्रचण्ड भुजदण्डोंवाले दैत्योका घमंड चूर करनेवाली देवि! तुम रूप
दो, जय दो, यश दो ओर काम क्रोध आदि शत्रुओंका नाश करो॥ २२॥ देवि
अम्बिके ! तुम अपने भक्तजनोंको सदा असीम आनन्द प्रदान करती रहती हो । मुझे
इस स्तोत्रका पाठ करके सप्तशतीरूपी महास्तोत्रका पाठ करता है, वह सप्तशतीकौ
जप-संख्यासे मिलनेवाले श्रेष्ठ फलको प्राप्त होता है। साथ ही वह प्रचुर