ब्रह्माजी बोले- ब्रह्मन्! एेसा साधन तो एक देवीका कवच ही है, जो
गोपनीयसे भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्णं प्राणियोंका उपकार करनेवाला
है। महामुने! उसे श्रवण करो॥ २॥ देवीकी नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हे ' नवदुर्गा!
कहते हैँ । उनके पृथक्-पृथक् नाम बतलाये जाते हैँ । प्रथम नाम शैलपुत्री *
प्रसिद्ध है। चौथी मूर्तिको कृष्माण्डार कहते हैं। पांचवीं दुर्गाका नाम
स्कन्दमाता है। देवीके छठे रूपको कात्यायनी" कहते हैं। सातवाँ कालरात्रिः
और आठवाँ स्वरूप महागौरी नामसे प्रसिद्ध है। नवीं दुर्गाका नाम
सिद्धिदात्री: है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवानके द्वारा ही प्रतिपादित
हुए हैं॥३--५॥ जो मनुष्य अग्निमें जल रहा हो, रणभूमिमें शत्रुओंसे
घिर गया हो, विषम संकटमें फँस गया हो तथा इस प्रकार भयसे आतुर
होकर जो भगवती दुर्गाको शरणमें प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई अमंगल
नहीं होता। युद्धके समय संकटमें पड़नेपर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं
तथापि हिमालयकी तपस्या और प्रार्थनासे प्रसन्न हो कृपापूर्वक उनकी पुत्रीके रूपमें प्रकट हुई ।
यह बात पुराणोंमें प्रसिद्ध है। १. ब्रह्म चारयितुं शीलं यस्याः सा ब्रह्मचारिणी-- सच्चिदानन्दमय
ब्रह्मस्वरूपकी प्राप्ति कराना जिनका स्वभाव हो, वे ' ब्रह्मचारिणी ' हैं। २. चन्द्र; घण्टायां यस्याः
सा-- आह्नादकारी चन्द्रमा जिनकी घण्टामे स्थित हों, उन देवीका नाम “चन्द्रघण्टा' है।
कूष्माण्डा । अर्थात् त्रिविध तापयुक्त संसार जिनके उदरमें स्थित है, वे भगवती ' कूष्माण्डा'
कहलाती हैं। ४. छान्दोग्यश्रुतिके अनुसार भगवतीकौ शक्तिसे उत्पन्न हुए सनत्कुमारका नाम
स्कन्द है । उनकी माता होनेसे वे स्कन्दमाता" कहलाती हैं । ५. देवताओंका कार्य सिद्ध
करनेके लिये देवी महर्षि कात्यायनके आश्रमपर प्रकट हुईं और महर्षिने उन्हें अपनी कन्या
माना; इसलिये ' कात्यायनी ' नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई । ६. सबको मारनेवाले कालकी भी रात्रि
(विनाशिका) होनेसे उनका नाम ' कालरात्रि ' है । ७. इन्होंने तपस्याद्वारा महान् गौरवर्ण प्राप्त
किया था, अतः ये महागौरी कहलायीं । ८. सिद्धि अर्थात् मोक्षको देनेवाली होनेसे उनका नाम
“सिद्धिदात्री ' है।
दिखायी देती । उन्हे शोक, दुःख और भयकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ६-७॥
जिन्होंने भक्तिपूर्वक देवीका स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय
होता है। देवेश्वरि ! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम निःसन्देह रक्षा करती
माहेश्वरी वृषभपर आरूढ होती हैँ । कोमारीका वाहन मयुर है । भगवान् विष्णुको
प्रियतमा लक्ष्मीदेवी कमलके आसनपर विराजमान हैं ओर हाथमे कमल धारण
किये हुए हें ॥ १०॥ वृषभपर आरूढ ईश्वरीदेवीने श्वेत रूप धारण कर रखा
हे । ब्राह्मीदेवी हंसपर बैठी हुई हैं और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित
इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकारके आभूषणोंकी
ये सम्पूर्णं देवियाँ क्रोधमे भरी हुई हैं और भक्तोंकी रक्षाके लिये रथपर
बैठी दिखायी देती हैँ । ये शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल ओर मुसल, खेटक
ओर तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त ओर त्रिशूल एवं
उत्तम शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथोंमें धारण करती हैँ । दैत्योके
शरीरका नाश करना, भक्तंको अभयदान देना और देवताओंका कल्याण
करना-- यही उनके शस्त्र-धारणका उदेश्य है ॥ १३-- १५॥ [कवच आरम्भ
करनेके पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये- ] महान् रौद्ररूप, अत्यन्त घोर
पराक्रम, महान् बल और महान् उत्साहवाली देवि! तुम महान् भयका नाश
करनेवाली हो, तुम्हें नमस्कार है ॥ १६॥ तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है ।
शत्रुओंका भय बढानेवाली जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो।
पूर्व दिशामें ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति) मेरी रक्षा करे। अग्निकोणमें अग्निशक्ति,
दक्षिण दिशामें वाराही तथा नैर््रत्यकोणमें खड्गधारिणी मेरी रक्षा करे।
पश्चिम दिशामें वारुणी और वायव्यकोणमें मृगपर सवारी करनेवाली देवी मेरी
रक्षा करे॥ १७-१८॥
ब्रह्माणि! तुम ऊपरकी ओरसे मेरी रक्षा करो और वैष्णवीदेवी नीचेको
ओरसे मेरी रक्षा करे॥ १९॥ इसी प्रकार शवको अपना वाहन बनानेवाली
चामुण्डादेवी दसो दिशाओंमें मेरी रक्षा करे।
जया आगेसे ओर विजया पीछेकी ओरसे मेरी रक्षा करे ॥ २०॥ वामभागमें
अजिता और दक्षिणभागमें अपराजिता रक्षा करे। उद्योतिनी शिखाकी रक्षा करे।
उमा मेरे मस्तकपर विराजमान होकर रक्षा करे॥ २१॥ ललाटमें मालाधरी
रक्षा करे ओर यशस्विनीदेवी मेरी भौंहोंका संरक्षण करे। भौंहोंके मध्यभागमें
त्रिनेत्रा ओर नथुनोंकी यमघण्टादेवी रक्षा करे ॥ २२॥ दोनों नेत्रौके मध्यभागमें
शंखिनी और कानमे द्वारवासिनी रक्षा करे। कालिकादेवी कपोलोंकी तथा
भगवती शांकरी कानोकि मूलभागकौ रक्षा करे ॥ २३॥ नासिकामें सुगन्धा और
ऊपरके ओठमें चर्चिकादेवी रक्षा करे। नीचेके ओठमें अमृतकला तथा जिहामें
घाँटीकी ओर महामाया तालुमे रहकर रक्षा करे ॥ २५॥ कामाक्षी ठोढ़ीकी और
सर्वमंगला मेरी वाणीकी रक्षा करे। भद्रकाली ग्रीवामें ओर धनुर्धरी पृष्ठवंश
(मेरुदण्ड) -में रहकर रक्षा करे ॥ २६॥ कण्ठके बाहरी भागमें नीलग्रीवा और
कण्टकौ नलीमें नलकूबरी रक्षा करे। दोनों कंधोम खड्गिनी और मेरी दोनों
भुजाओंकी वज्रधारिणी रक्षा करे ॥ २७॥ दोनों हाथोंमें दण्डिनी ओर अंगुलियोमें
अम्बिका रक्षा करे। शूलेश्वरी नखोंकी रक्षा करे। कुलेश्वरी कुक्षि (पेट) में
कामिनी और गुह्यभागकी गुह्येश्वरी रक्षा करे । पूतना ओर कामिका लिंगकौ
नारसिंही दोनों घुट्टियोंकी और तैजसीदेवी दोनों चरणके पृष्ठभागकौ रक्षा करे।
श्रीदेवी पैरोंकी अंगुलियोंमें और तलवासिनी पैरोके तलुओंमें रहकर रक्षा
करे ॥ ३२॥ अपनी दाढ़ोंके कारण भयंकर दिखायी देनेवाली दंष्टराकरालीदेवी
नखोंकी और ऊर्ध्वकेशिनीदेवी केशोंकी रक्षा करे। रोमावलियोंके छिद्रोंमें कौबेरी
और त्वचाकी वागीश्वरीदेवी रक्षा करे ॥ ३३॥ पार्वतीदेवी रक्त, मज्जा, वसा,
मांस, हड्डी और मेदकी रक्षा करे। आँतोंकी कालरात्रि और पित्तकी मुकुटेश्वरी
रक्षा करे॥ ३४॥ मूलाधार आदि कमल-कोशोंमें पद्मावतीदेवी और कफमें
जिसका किसी भी अस्त्रसे भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्यादेवी शरीरकी
और समान वायुकी रक्षा करे। कल्याणसे शोभित होनैवाली भगवती कल्याणशोभना
मेरे प्राणकी रक्षा करे ॥ ३७॥ रस, रूप, गन्ध, शब्द ओर स्पर्श-- इन विषयोंका
अनुभव करते समय योगिनीदेवी रक्षा करे तथा सत्त्वगुण, रजोगुण और
तमोगुणको रक्षा सदा नारायणीदेवी करे ॥ ३८॥ वाराही आयुको रक्षा करे।
वैष्णवी धर्मकी रक्षा करे तथा चक्रिणी (चक्र धारण करनेवाली) -देवी यश,
कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्याकौ रक्षा करे॥ ३९॥ इन्द्राणि! आप मेरे गोत्रकौ
रक्षा करं । चण्डिके ! तुम मेरे पशुओंकी रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रोंकी रक्षा करे
ओर भैरवी पत्नीकी रक्षा करे ॥ ४०॥ मेरे पथकौ सुपथा तथा मार्गकी क्षेमकरी
रक्षा करे । राजाके दरबारमें महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहनेवाली
देवि! जो स्थान कवचमें नहीं कहा गया है, अतएव रक्षासे रहित है, वह सब
यदि अपने शरीरका भला चाहे तो मनुष्य बिना कवचके कहीं एक पग
भी न जाय-- कवचका पाठ करके ही यात्रा करे। कवचके द्वारा सब ओरसे
सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है, वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा
सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धि करनेवाली विजयकी प्राप्ति होती हे। वह जिस-
जिस अभीष्ट वस्तुका चिन्तन करता है, उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर
लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वीपर तुलनारहित महान् रेश्वर्यका भागी होता
हे ॥ ४३-४४॥ कवचसे सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्धमें उसकी
पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोकम पूजनीय होता हे ॥ ४५॥ देवीका यह
कवच देवताओंके लिये भी दुर्लभ हे । जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओके
समय श्रद्धाके साथ इसका पाठ करता है, उसे दैवी कला प्राप्त होती है
तथा वह तीनों लोकोमें कहीं भी पराजित नहीं होता। इतना ही नहीं, वह
अपमृत्युसे * रहित हो सौसे भी अधिक वर्षोतक जीवित रहता है ॥ ४६-४७॥
मकरी, चेचक ओर कोढ़ आदि उसकी सम्पूर्णं व्याधियाँ नष्ट हो जाती हें ।
कनेर, भांग, अफीम, धतूरे आदिका स्थावर विष, साँप ओर विच्छ आदिके
काटनेसे चढ़ा हुआ जंगम विष तथा अहिफेन और तेलके संयोग आदिसे
बननेवाला कृत्रिम विष--ये सभी प्रकारके विष दूर हो जाते हैं, उनका कोई
असर नहीं होता ॥ ४८॥ इस पृथ्वीपर मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक
प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकारके जितने मन्त्र-यन्त्र होते हैं, वे सब इस कवचको
हदयमें धारण कर लेनेपर उस मनुष्यको देखते ही नष्ट हो जाते हैं। ये ही नहीं,
पृथ्वीपर विचरनेवाले ग्रामदेवता, आकाशचारी देवविशेष, जलके सम्बन्धसे
प्रकट होनेवाले गण, उपदेशमात्रसे सिद्ध होनेवाले निम्नकोरिके देवता, अपने
जन्मके साथ प्रकट होनेवाले देवता, कुलदेवता, माला (कण्ठमाला आदि),
डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्षे विचरनेवाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ,
ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव
आदि अनिष्टकारकं देवता भी हदयमें कवच धारण किये रहनेपर उस मनुष्यको
देखते ही भाग जाते हैँ । कवचधारी पुरुषको राजासे सम्मान वृद्धि प्राप्त होती
हे । यह कवच मनुष्यके तेजको वृद्धि करनेवाला और उत्तम है ॥ ४९--५२॥
कवचका पाठ करनेवाला पुरुष अपनी कौर्तिसे विभूषित भूतलपर अपने
सुयशके साथ-साथ वृद्धिको प्राप्त होता है। जो पहले कवचका पाठ करके
उसके बाद सप्तशती चण्डीका पाठ करता है, उसकी जबतक वन, पर्वत और
काननोंसहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तबतक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि
संतानपरम्परा बनी रहती है॥५३-५४॥ फिर देहका अन्त होनेपर वह पुरुष
भगवती महामायाके प्रसादसे उस नित्य परमपदको प्राप्त होता है, जो देवताओंके
लिये भी दुर्लभ है ॥ ५५॥ वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता ओर कल्याणमय