शंकरजी पार्वतीजीसे कहते है -- कमलानने! अब मैं अष्टोत्तरशतनामका
वर्णन करता हूँ, सुनो; जिसके प्रसाद (पाठ या श्रवण) -मात्रसे परम
(सत्-स्वरूपा), २४-सत्यानन्दस्वरूपिणी, २५-अनन्ता (जिनके
स्वरूपका कहीं अन्त नहीं ), २६- भाविनी (सबको उत्पन्न करनेवाली),
२७- भाव्या (भावना एवं ध्यान करनेयोग्य), २८-भव्या (कल्याणरूपा),
२९-अभव्या (जिससे बढ़कर भव्य कहीं है नहीं), ३०-सदागति,
८७-वृद्धमाता, ८८-बलप्रदा, ८९-महोदरी, ९०-मुक्तकेशी, ९१-घोररूपा,
९२-महाबला, ९३-अग्निज्वाला, ९४-रोद्रमुखी, ९५- कालरात्रि, ९६ - तपस्विनी,
९७-नारायणी, ९८- भद्रकाली, ९९ - विष्णुमाया, १००- जलोदरी, १०१-शिवदूती,
१०२-कराली, १०२३-अनन्ता (विनाशरहिता), १०४- परमेश्वरी, १०५- कात्यायनी,
१०६- सावित्री, १०७-प्रत्यक्षा, १०८-ब्रह्मवादिनी ॥ २--१५॥
देवी पार्वती! जो प्रतिदिन दुर्गाजीके इस अष्टोत्तरशतनामका
सनातन मुक्ति भी प्राप्त कर लेता है॥ १७॥ कुमारीका पूजन और देवी
सुरेश्वरीका ध्यान करके पराभक्तिके साथ उनका पूजन करे, फिर अष्टोत्तरशत-
नामका पाठ आरम्भ करे ॥ १८॥ देवि! जो ऐसा करता है, उसे सब श्रेष्ठ
देवताओंसे भी सिद्धि प्राप्त होती है। राजा उसके दास हो जाते हैँ । वह
राज्यलक्ष्मीको प्राप्त कर लेता हे ॥ १९॥ गोरोचन, लाक्षा, कुंकुम, सिन्दूर,
कपूर, घी (अथवा दूध), चीनी और मधु--इन वस्तुओंको एकत्र करके इनसे
विधिपूर्वक यन्त्र लिखकर जो विधिज्ञ पुरुष सदा उस यन्त्रको धारण करता
है, वह शिवके तुल्य (मोक्षरूप) हो जाता है ॥ २०॥ भौमवती अमावास्याकी
आधी रातमें, जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्रपर हों, उस समय इस स्तोत्रको