मार्कण्डेयजी कहते हैँ- विशुद्ध ज्ञान ही जिनका शरीर है, तीनों वेद ही
जिनके तीन दिव्य नेत्र हैं, जो कल्याण- प्राप्तिके हेतु हैं तथा अपने मस्तकपर
मन्त्रोंका जो अभिकीलक है अर्थात् मन्त्रौको सिद्धिमें विघ्न उपस्थित करनेवाले
शापरूपी कौलकका जो निवारण करनेवाला है, उस सप्तशतीस्तोत्रको सम्पूर्णरूपसे
जानना चाहिये (ओर जानकर उसकी उपासना करनी चाहिये), यद्यपि
सप्तशतीके अतिरिक्त अन्य मन्त्रोंके जपमें भी जो निरन्तर लगा रहता है, वह
भी कल्याणका भागी होता हे ॥ २॥ उसके भी उच्चाटन आदि कर्म सिद्ध होते
हैं तथा उसे भी समस्त दुर्लभ वस्तुओंकी प्राप्ति हो जाती है; तथापि जो अन्य
मन्त्रोंका जप न करके केवल इस सप्तशती नामक स्तोत्रसे ही देवीकी स्तुति
उन्हें अपने कार्यकौ सिद्धिके लिये मन्त्र, ओषधि तथा अन्य किसी साधनके
उपयोगकी आवश्यकता नहीं रहती । बिना जपके ही उनके उच्चाटन आदि
समस्त आभिचारिक कर्म सिद्ध हो जाते हैँ ॥४॥ इतना ही नहीं, उनकी सम्पूर्ण
अभीष्ट वस्तु भी सिद्ध होती हैँ । लोगोके मनमें यह शंका थी कि जब
केवल सप्तशतीको उपासनासे अथवा सप्तशतीको छोडकर अन्य मन्त्रौको
उपासनासे भी समानरूपसे सब कार्य सिद्ध होते हैं, तब इनमें श्रेष्ठ कौन-सा
साधन है ?' लोगोंकी इस शंकाको सामने रखकर भगवान् शंकरने अपने पास
आये हुए जिज्ञासुओंको समझाया कि यह सप्तशती नामक सम्पूर्ण स्तोत्र ही
कर दिया। सप्तशतीके पाठसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उसकी कभी समाप्ति नहीं
होती; किंतु अन्य मन्त्रोंके जपजन्य पुण्यकी समाप्ति हो जाती है। अत: भगवान्
शिवने अन्य मन्त्रोंकी अपेक्षा जो सप्तशतीकी ही श्रेष्ठताका निर्णय किया, उसे
यथार्थ ही जानना चाहिये॥६॥ अन्य मन्त्रोंका जप करनेवाला पुरुष भी यदि
सप्तशतीके स्तोत्र ओर जपका अनुष्ठान कर ले तो वह भी पूर्णरूपसे ही कल्याणका
भागी होता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जो साधक कृष्णपक्षकी
चतुर्दशी अथवा अष्टमीको एकाग्रचित्त होकर भगवतीकी सेवामें अपना सर्वस्व
समर्पित कर देता है और फिर उसे प्रसादरूपसे ग्रहण करता है, उसीपर भगवती
प्रसन होती हैं; अन्यथा उनकी प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती।* इस प्रकार सिद्धिके
प्रतिबन्धकरूप कौलके द्वारा महादेवजीने इस स्तोत्रको कीलित कर रखा
है ॥ ७-८ ॥ जो पूर्वोक्त रीतिसे निष्कीलन करके इस सप्तशतीस्तोत्रका प्रतिदिन
स्पष्ट उच्चारणपूर्वक पाठ करता है, वह मनुष्य सिद्ध हो जाता है, वही देवीका पार्षद
होता है और वही गन्धर्व भी होता हे ॥ ९ ॥ सर्वत्र विचरते रहनेपर भी इस संसारमें
उसे कहीं भी भय नहीं होता । वह अपमृत्युके वशमें नहीं पडता तथा देह त्यागनेके
अनन्तर मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥ १०॥ अतः कीलनको जानकर उसका परिहार
करके ही सप्तशतीका पाठ आरम्भ करे। जो ऐसा नहीं करता, उसका नाश हो जाता
है ।२ इसलिये कीलक और निष्कीलनका ज्ञान प्राप्त करनेपर ही यह स्तोत्र निर्दोष
उपर्युक्त तिथिको देवीकौ सेवामें उपस्थित हो अपना न्यायोपाजित धन उन्हें अर्पित करते
हुए एकाग्रचित्तसे प्रार्थना करे" मातः! आजसे यह सारा धन तथा अपने-आपको भी मैंने
आपकी सेवामे अर्पण कर दिया। इसपर मेरा कोई स्वत्व नहीं रहा ।' फिर भगवतीका
ध्यान करते हुए यह भावना करे, मानो जगदम्बा कह रही हैं--'बेटा! संसार यात्राके
निर्वाहार्थं तू मेरा यह प्रसादरूप धन ग्रहण कर।' इस प्रकार देवीकी आज्ञा शिरोधार्य करके
उस धनको प्रसाद-बुद्धिसे ग्रहण करे ओर धर्मशास्त्रोक्तं मार्गसे उसका सदव्यय करते
हुए सदा देवीके ही अधीन होकर रहे। यह “दानप्रतिग्रह-करण' कहलाता है। इससे
स्त्रियोंमें जो कुछ भी सौभाग्य आदि दृष्टिगोचर होता है, वह सब देवीके
प्रसादका ही फल है। अतः इस कल्याणमय स्तोत्रका सदा जप करना
चाहिये ॥ १२॥ इस स्तोत्रका मन्दस्वरसे पाठ करनेपर स्वल्प फलकी प्राप्ति
होती है और उच्वस्वरसे पाठ करनेपर पूर्ण फलकौ सिद्धि होती है। अतः
उच्चस्वरसे ही इसका पाठ आरम्भ करना चाहिये ॥ १३॥ जिनके प्रसादसे
ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, सम्पत्ति, शत्रुनाश तथा परम मोक्षकी भी सिद्धि होती
होना कहा है। वास्तवमें किसी प्रकार भी देवीका पाठ करे, उससे लाभ ही होता है।
यह बात वचनान्तरोसे सिद्ध है।
इसके अनन्तर रात्रिसूक्तका पाठ करना उचित है । पाठके आरम्भमें रात्रिसूक्त
ओर अन्तमें देवीसूक्तके पाठक विधि है। मारीचकल्पका वचन है--
रात्रिसूक्तं पठेदादौ मध्ये सप्तशतीस्तवम्।
प्रान्ते तु पठनीयं वै देवीसूक्तमिति क्रमः॥
रात्रिसूक्तके बाद विनियोग, न्यास और ध्यानपूर्वक नवार्णमन्त्रका जप
करके सप्तशतीका पाठ आरम्भ करना चाहिये । पाठके अन्तमं पुनः विधिपूर्वक
नवार्णमन्त्रका जप करके देवीसूक्तका तथा तीनों रहस्योका पाठ करना उचित
हे । कोई-कोई नवार्णजपके बाद रत्रिसूक्तका पाठ बतलाते हैं तथा अन्तमें
भी देवीसूक्तके बाद नवार्णजपका ओचित्य प्रतिपादन करते हैं; किंतु यह
ठीक नहीं है। चिदम्बरसंहितामे कहा है-- ' मध्ये नवार्णपुटितं कृत्वा
स्तोत्रं सदाभ्यसेत्।' अर्थात् सप्तशतीका पाठ बीचमें हो ओर आदि-अन्तमें
नवार्णजपसे उसे सम्पुटित कर दिया जाय । डामरतन्त्रमें यह बात अधिक स्पष्ट
कर दी गयी है
शतमादौ शतं चान्ते जपेन्मन्त्रं नवार्णकम्।
चण्डीं सप्तशतीं मध्ये सम्पुटोऽयमुदाहतः ॥
अर्थात् आदि ओर अन्तमं सौ-सौ बार नवार्णमन्त्रका जप करे ओर
मध्यमे सप्तशती दुर्गाका पाठ करे; यह सम्पुट कहा गया है। यदि आदि-
अन्तमें रात्रिसूक्त और देवीसूक्तका पाठ हौ और उसके पहले एवं अन्तमें
नवार्ण-जप हो, तब तो वह पाठ नवार्ण-सम्पुटित नहीं कहला सकता;
क्योंकि जिससे सम्पुट हो उसके मध्यमे अन्य प्रकारके मन्त्रका प्रवेश नहीं
होना चाहिये। यदि बीचमें रात्रिसूक्त ओर देवीसूक्त रहेंगे तो वह पाठ
उन्हींसे सम्पुटित कहलायेगा; ऐसी दशामें डामरतन्त्र आदिके वचनोंसे स्पष्ट
ही विरोध होगा। अतः पहले रत्रिसूक्त, फिर नवार्ण-जप, फिर न्यासपूर्वक
सप्तशती-पाठ, फिर विधिवत् नवार्ण-जप, फिर क्रमशः देवीसूक्त एवं रहस्य-
त्रयका पाठ-- यही क्रम ठीक है। रत्रिसूक्त भी दो प्रकारके हैँ वैदिक और
तान्त्रिक । वैदिक रात्रिसूक्त ऋ्वेदकी आठ ऋचाएँ हैं ओर तान्त्रिक तो
दर्गासप्तशतीके प्रथमाध्याये ही है। यहाँ दोनों दिये जाते हैँ । रत्रिदेवताके
प्रतिपादक सूक्तको रात्रिसूक्त कहते हैँ । यह रत्रिदेवी दो प्रकारकौ हैं-- एक
जीवरात्रि ओर दूसरी ईश्वररात्रि। जीवरात्रि वही है, जिसमें प्रतिदिन जगत्के
साधारण जीवोंका व्यवहार लुप्त होता है। दूसरी ईश्वररात्रि वह है, जिसमें
"रात्रिसूक्तम् * ४९
ईश्वरके जगद्रूप व्यवहारका लोप होता है; उसीको कालरत्रि या महाप्रलयरात्रि
कहते हँ । उस समय केवल ब्रह्म ओर उनकी मायाशक्ति, जिसे अव्यक्त प्रकृति
कहते हैं, शेष रहती है। इसकी अधिष्ठात्रीदेवी ' भुवनेश्वरी ' हैं।' रात्रिसूक्तसे
उन्हींका स्तवन होता है।
अथ वेदोक्तं रात्रिसूक्तम्
ॐ रात्रीत्याद्यष्टर्चस्य सूक्तस्य कुशिकः सौभरो रात्रिर्वा भारद्वाजो
करनेवाली ये रात्रिरूपा देवी अपने उत्पन्न किये हुए जगत्के जीवोके शुभाशुभ
कर्मोको विशेषरूपसे देखती हैं और उनके अनुरूप फलकी व्यवस्था करनेके
तथा ऊपर बढ़नेवाले वृक्षोंको भी व्याप्त करके स्थित हैं; इतना ही नहीं, ये
परा चिच्छक्तिरूपा रात्रिदेवी आकर अपनी बहिन ब्रह्मविद्यामयी उषादेवीको