उसने कहा-मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ। मुझसे प्रकृति-पुरुषात्मक सद्रूप और
महिमा बतायी गयी है । इसके पाठसे देवीकी कृपा शीघ्र प्राप्त होती है, यद्यपि
सप्तशतीपाठका अंग बनाकर इसका अन्यत्र कहीं उल्लेख नहीं हुआ है तथापि यदि
सप्तशतीस्तोत्र आरम्भ करनेसे पूर्व इसका पाठ कर लिया जाय तो बहुत बड़ा लाभ हो
अहमानन्दानानन्दौ । अहं विन्ञानाविज्ञाने। अहं
मैं आनन्द ओर अनानन्दरूपा हूँ । मैं विज्ञान और अविज्ञानरूपा हूं । अवश्य
जाननेयोग्य ब्रह्म और अब्रह्म भी मैं ही हूँ। पंचीकृत ओर अपंचीकृत महाभूत
वेद और अवेद मैं हूँ। विद्या और अविद्या भी मैं, अजा और
अनजा (प्रकृति और उससे भिन्न) भी मैं, नीचे-ऊपर, अगल-बगल भी मैं
मैं रुद्रो ओर वसुओंके रूपमे संचार करती हूँ। मैं आदित्यों और
विश्वेदेवोंके रूपोंमें फिरा करती हूँ। मैं मित्र और वरुण दोनोंका, इन्द्र
मैं सोम, त्वष्टा, पूषा ओर भगको धारण करती हूँ। त्रैलोक्यको आक्रान्त
करनेके लिये विस्तीर्णं पादक्षेप करनेवाले विष्णु, ब्रह्मदेव और प्रजापतिको
सकता है। इस उदेश्यसे हम रात्रिसक्तक बाद इसका समावेश करते हैं। आशा है,
जगदम्बाके उपासक इससे संतुष्ट होंगे।
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय
सुन्वते। अहं राष्टी सङ्कमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा
यज्ञियानाम्। अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः
लिये हविर्द्रव्योसे युक्त धन धारण करती हूँ। मैं सम्पूर्ण जगत्की ईश्वरी,
उपासकोंको धन देनेवाली, ब्रह्मरूप और यज्ञा्होमिं (यजन करनेयोग्य देवोंमें)
मुख्य हूँ। मैं आत्मस्वरूपपर आकाशादि निर्माण करती हूँ। मेरा स्थान
आत्मस्वरूपको धारण करनेवाली बुद्धिवृत्तिमें है । जो इस प्रकार जानता है, वह
तब उन देवने कहा- देवीको नमस्कार है। बड़े-बड़ोंको अपने-अपने
कर्तव्यम प्रवृत्त करनेवाली कल्याणकर््रीको सदा नमस्कार है। गुणसाम्या-
वस्थारूपिणी मंगलमयी देवीको नमस्कार हे । नियमयुक्त होकर हम उन्हें प्रणाम
हम महालक्ष्मीको जानते हैं और उन सर्वशक्तिरूपिणीका ही ध्यान करते
हे दक्ष! आपकी जो कन्या अदिति हैं, वे प्रसूता हुई ओर उनके मृत्युरहित
स, क, ल~ वर्ण और माया (हीं )-- यह सर्वात्मिका जगन्माताकी मूल विद्या
प्रसिद्ध है । इसके छः प्रकारके अर्थ अर्थात् भावार्थ, वाच्यार्थ, सम्प्रदायार्थ, लोकिकार्थ,
श्रुतिमें भी ये मन्त्र इस प्रकारसे अर्थात् क्वचित् स्वरूपोच्वार, क्वचित् लक्षणा
ओर लक्षित लक्षणासे और कहीं वर्णि पृथक्-पृथक् अवयव दर्शाकर जान-
बूझकर विशंखलरूपसे कहे गये हैँ । इससे यह मालूम होगा कि ये मन्त्र कितने
गोपनीय ओर महत्त्वपूर्ण हैं।]
ये परमात्माकौ शक्ति हैँ । ये विश्वमोहिनी हैँ । पाश, अंकुश, धनुष और
बाण धारण करनेवाली हे । ये ' श्रीमहाविद्या ' हैँ । जो ऐसा जानता हे, वह शोकको
(मन्त्रदरष्टा ऋषि कहते हैं-- ) वही ये अष्ट वसु हैं; वही ये एकादश रद्र
हैं; वही ये द्वादश आदित्य हैं; वही ये सोमपान करनेवाले और सोमपान न
करनेवाले विश्वेदेव हैं; वही ये यातुधान (एक प्रकारके राक्षस), असुर, राक्षस,
पिशाच, यक्ष ओर सिद्ध हैं; वही ये सत्त्व रज-तम हैं; वही ये ब्रह्म विष्णु
रुद्ररूपिणी हैं; वही ये प्रजापति-इन्द्र-मनु हैं; वही ये ग्रह, नक्षत्र और
तारे हैं; वही कला-काष्ठादि कालरूपिणी हैं; उन पाप नाश करनेवाली,
भोग- मोक्ष देनेवाली, अन्तरहित, विजयाधिष्ठात्री, निर्दोष, शरण लेनयोग्य,
वियत्- आकाश (ह) तथा “ई' कारसे युक्त, वीतिहोत्र अग्नि (र)-
सहित, अर्धचन्द्र ()-से अलंकृत जो देवीका बीज है, वह सब मनोरथ पूर्ण
करनेवाला है । इस प्रकार इस एकाक्षर ब्रह्म (हीं)-का ऐसे यति ध्यान करते
हैं, जिनका चित्त शुद्ध है, जो निरतिशयानन्दपूर्ण और ज्ञानके सागर हैं। (यह
मन्त्र देवीप्रणव माना जाता है। ॐकारके समान ही यह प्रणव भी व्यापक अर्थसे
भरा हुआ है। संक्षेपमें इसका अर्थ इच्छा-ज्लान-क्रिया, धार, अद्वैत, अखण्ड,
सच्चिदानन्द, समरसीभूत, शिवशक्तिस्फुरण है ।) ॥ १८-१९॥
वाणी (ए), माया (हीं), ब्रह्मसू- काम (क्लीं), इसके आगे छटा व्यंजन
अर्थात् च, वही वक्त्र अर्थात् आकारसे युक्त (चा), सूर्य (म), अवाम श्रोत्र
दक्षिण कर्ण (उ) और बिन्दु अर्थात् अनुस्वारसे युक्त (मुं), टकारसे तीसरा
ड, वही नारायण अर्थात् 'आ' से मिश्र (डा), वायु (य), वही अधर अर्थात्
'ऐ' से युक्त (यै) ओर "विच्चे" यह नवार्णमन्त्र उपासकोंको आनन्द और
समय तुम्हारा ध्यान करते हैं। हे महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती-
स्वरूपिणी चण्डिके! तुम्हें नमस्कार है । अविद्यारूप रज्जुकी दृढ़ ग्रन्थिको खोलकर
मुझे मुक्त करो।]
हत्कमलके मध्यमें रहनेवाली, प्रातःकालीन सूर्यके समान प्रभावाली, पाश
और अंकुश धारण करनेवाली, मनोहर रूपवाली, वरद और अभयमुद्रा धारण
किये हुए हाथोंवाली, तीन नेत्रोंसे युक्त, रक्तवस्त्र परिधान करनेवाली और
महाभयका नाश करनेवाली, महासंकटको शान्त करनेवाली और महान्
जिसका स्वरूप ब्रह्मादिक नहीं जानते--इसलिये जिसे अज्ञेया कहते हैं,
जिसका अन्त नहीं मिलता--इसलिये जिसे अनन्ता कहते हैं, जिसका लक्ष्य दीख
नहीं पड़ता-- इसलिये जिसे अलक्ष्या कहते हैं, जिसका जन्म समझमें नहीं आता--
इसलिये जिसे अजा कहते हैं, जो अकेली ही सर्वत्र है--इसलिये जिसे एका कहते
हैं, जो अकेली ही विश्वरूपमें सजी हुई है-- इसलिये जिसे नैका कहते हैं, वह
इदमथर्वशीर्षमज्ञात्वा योऽर्चां स्थापयति- शतलक्षं
प्रजप्त्वापि सोऽर्चासिद्ि न विन्दति। शतमष्टोत्तरं चास्य
उन दुर्विज्ञेय, दुराचारनाशक और संसारसागरसे तारनेवाली दुगदिवीको
इस अथर्वशीर्षका जो अध्ययन करता है, उसे पाचों अथर्वशीर्षेकि जपका
फल प्राप्त होता है। इस अथर्वशीर्षको न जानकर जो प्रतिमास्थापन करता है,
वह सैकड़ों लाख जप करके भी अर्चासिद्धि नहीं प्राप्त करता। अष्टोत्तरशत
(१०८ बार) जप (इत्यादि) इसकी पुरश्चरणविधि है । जो इसका दस बार पाठ
करता है, वह उसी क्षण पापोंसे मुक्त हो जाता है और महादेवीके प्रसादसे बड़े
इसका सायंकालमे अध्ययन करनेवाला दिनमें किये हुए पापका नाश करता
है, प्रातःकालमे अध्ययन करनेवाला रात्रिम किये हुए पापोका नाश करता है।