कामेश्वरीका हृदयमें चिन्तन करता हूँ। वे तपाये हुए सुवर्णके समान सुन्दर
हैं। सूर्य, चन्द्रमा ओर अग्नि--ये ही तीन उनके नेत्र हैं तथा वे अपने मनोहर
ऋषि कहते हैं--॥ १॥ राजन्! अपने प्राणोके समान प्यारे भाई निशुम्भको
देवी बोलीं --॥ ४॥ ओ दुष्ट ! मैं अकेली ही हूँ । इस संसारमें मेरे सिवा दूसरी
देवी बोलीं --॥ ७॥ मैं अपनी एेश्वर्यशक्तिसे अनेक रूपोंमें यहाँ उपस्थित
ऋषि कहते हैं--॥ ९॥ तदनन्तर देवी ओर शुम्भ दोनोंमें सब देवताओं
तथा दानवोंके देखते-देखते भयंकर युद्ध छिड़ गया ॥ १०॥ बाणोंकी वर्षा
तथा तीखे शस्त्रो एवं दारुण अस्त्रक प्रहारके कारण उन दोनोंका युद्ध
उस समय अम्निकादेवीने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े, उन्हें दैत्यराज
शुम्भने उनके निवारक अस्त्रोद्रारा काट डाला॥ १२॥ इसी प्रकार शुम्भने भी
जो दिव्य अस्त्र चलाये; उन्हें परमेश्वरीने भयंकर हुंकार शब्दके उच्चारण
आदिद्रारा खिलवाडमें ही नष्ट कर डाला॥ १३॥ तब उस असुरने सैकड़ों
नाणोसे देवीको आच्छादित कर दिया। यह देख क्रोधमें भरी हुई उन देवीने
भी बाण मारकर उसका धनुष काट डाला॥ १४॥ धनुष कट जानेपर फिर
देत्यराजने शक्ति हाथमे ली, किंतु देवीने चक्रसे उसके हाथकी शक्तिको भी
काट गिराया ॥ १५॥ तत्पश्चात् दैत्योके स्वामी शुम्भने सौ चाँदवाली चमकती
हुई ढाल ओर तलवार हाथमें ले उस समय देवीपर धावा किया ॥ १६॥ उसके
आते ही चण्डिकाने अपने धनुषसे छोड़े हुए तीखे बाणोंद्वारा उसकी सूर्य-
लिया ॥ १८॥ उसे आते देख देवीने अपने तीक्ष्ण बाणोँसे उसका मुद्गर भी काट
देत्य ओर चण्डिका आकाशमें एक-दूसरेसे लड़ने लगे। उनका वह युद्ध पहले
उठाकर घुमाया और पृथ्वीपर पटक दिया॥२४॥ पटके जानेपर पृथ्वीपर
आनेके बाद वह दुष्टात्मा दैत्य पुनः चण्डिकाका वध करनेके लिये उनकी
ओर बड़े वेगसे दौड़ा ॥ २५॥ तब समस्त दैत्योके राजा शुम्भको अपनी ओर
देवीके शूलको धारसे घायल होनेपर उसके प्राण-पखेरू उड़ गये और वह
समुद्रो, द्वीपों तथा पर्वतोंसहित समूची पृथ्वीको कपाता हुआ भूमिपर गिर
पडा ॥ २७॥ तदनन्तर उस दुरात्माके मारे जानेपर सम्पूर्णं जगत् प्रसनन एवं पूर्ण
स्वस्थ हो गया तथा आकाश स्वच्छ दिखायी देने लगा ॥ २८॥ पहले जो
उत्पातसूचक मेघ ओर उल्कापात होते थे, वे सब शान्त हो गये तथा उस
और गन्धर्वगण मधुर गीत गाने लगे॥ ३०॥ दूसरे गन्धर्व बाजे बजाने लगे और
अप्सराएँ नाचने लगीं । पवित्र वायु बहने लगी। सूर्यकौ प्रभा उत्तम हो
गयी ॥ ३१॥ अग्निशालाकौ बुझी हुई आग अपने-आप प्रज्वलित हो उठी तथा
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत
देवीयाहात्म्यमें “गुम्भ. वक्ष” नामक दसवाँ