मैं भुवनेश्वरीदेवीका ध्यान करता हूँ। उनके श्रीअंगोंकी आभा प्रभातकालके
सूर्यके समान है और मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट है। वे उभरे हुए स्तनों
और तीन नेत्रोंसे युक्त है । उनके मुखपर मुसकानकी छटा छायी रहती है
और हाथोंमें वरद, अंकुश, पाश एवं अभय-मुद्रा शोभा पाते हैं।
ऋषि कहते हैं--॥१॥ देवीके द्वारा वहाँ महादैत्यपति शुम्भके मारे
जानेपर इन्द्र॒ आदि देवता अग्निको आगे करके उन कात्यायनीदेवीकौ स्तुति
करने लगे। उस समय अभीष्टकौ प्राप्ति होनेसे उनके मुखकमल दमक उठे
देवता बोले--शरणागतकी पीडा दूर करनेवाली देवि! हमपर प्रसन्न होओ।
सम्पूर्णं जगत्की माता! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि ! विश्वको रक्षा करो। देवि।
तुम्हीं चराचर जगत्की अधीश्वरी हो ॥३॥ तुम इस जगत्का एकमात्र आधार
हो; क्योकि पृथ्वीरूपमें तुम्हारी ही स्थिति है । देवि ! तुम्हारा पराक्रम अलंघनीय है ।
तुम्हीं जलरूपमें स्थित होकर सम्पूर्णं जगत्को तृप्त करती हो ॥४॥ तुम अनन्त
बलसम्पन वैष्णवी शक्ति हो। इस विश्वकौ कारणभूता परा माया हो। देवि!
तुमने इस समस्त जगत्को मोहित कर रखा है । तुम्हीं प्रसन होनेपर इस
पृथ्वीपर मोक्षकी प्राप्ति कराती हो॥५॥ देवि! सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हरे ही
नारायणि! तुम प्रसन्न होओ। तुम्हें नमस्कार है ॥ १६ ॥ हाथमे भयानक महाचक्र लिये
और दाढ़ोंपर धरतीको उठाये वाराहीरूपधारिणी कल्याणमयी नारायणि! तुम्हें
नमस्कार है॥ १७॥ भयंकर नृसिंहरूपसे दैत्योके वधके लिये उद्योग करनेवाली
उदीप्त दिखायी देनेवाली और वृत्रासुरके प्राणोका अपहरण करनेवाली इन्द्रशक्तिरूपा
नारायणी देवि! तुम्हें नमस्कार है ॥ १९॥ शिवदूतीरूपसे दैत्योंकी महती सेनाका
संहार करनेवाली, भयंकर रूप धारण तथा विकट गर्जना करनेवाली नारायणि ! तुम्हें
नमस्कार है॥ २०॥ दाढ़ोंके कारण विकराल मुखवाली मुण्डमालासे विभूषित
मुण्डमर्दिनी चामुण्डारूपा नारायणि! तुम्हें नमस्कार है ॥ २१॥ लक्ष्मी, लज्जा,
महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवा, महार त्रि तथा महा-अविद्यारूपा नारायणि ! तुम्हें
नमस्कार है ॥ २२॥ मेधा, सरस्वती, वरा (श्रेष्ठा), भूति (ऐश्वर्यरूपा), बाभ्रवी
( भूरे रंगकी अथवा पार्वती), तामसी (महाकाली), नियता (संयमपरायणा) तथा
होनेवाला, अत्यन्त भयंकर ओर समस्त असुरोका संहार करनेवाला तुम्हारा
त्रिशूल भयसे हमें बचाये। तुम्हें नमस्कार है ॥ २६॥ देवि! जो अपनी ध्वनिसे
सम्पूर्णं जगत्को व्याप्त करके दैत्योके तेज नष्ट किये देता है, वह तुम्हारा घण्टा
हमलोगोंकी पापोंसे उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रोंकी बुरे
कर्मोसे रक्षा करती है ॥ २७॥ चण्डिके! तुम्हरे हाथोमे सुशोभित खड्ग, जो
असुरोके रक्त और चर्बीसे चचित है, हमारा मंगल करे। हम तुम्हें नमस्कार
देवि! तुम प्रसन्न होनेपर सब रोगोंको नष्ट कर देती हो ओर कुपित होनेपर
मनोवांछित सभी कामनाओंका नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरणमें जा
चुके हैं, उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरणमें गये हुए मनुष्य
दूसरोंको शरण देनेवाले हो जाते हैं॥२९॥ देवि! अम्बिके!! तुमने अपने
स्वरूपको अनेक भागोंमें विभक्त करके नाना प्रकारके रूपोंसे जो इस समय
इन धर्मद्रोही महादैत्योंका संहार किया है, वह सब दूसरी कौन कर सकती
थी २॥ ३०॥ विद्याओंमें, ज्ञानको प्रकाशित करनेवाले शास्त्रोंमें तथा आदिवाक्यों
(वेदों )-में तुम्हारे सिवा और किसका वर्णन है? तथा तुमको छोड़कर दूसरी
कौन ऐसी शक्ति है, जो इस विश्वको अज्ञानमय घोर अन्धकारसे परिपूर्ण
दावानलो यत्र॒ तथाब्धिमध्ये
और जहाँ दावानल हो, वहाँ तथा समुद्रके बीचमें भी साथ रहकर तुम विश्वकी
रक्षा करती हो ॥ ३२ ॥ विश्वेश्वरि | तुम विश्वका पालन करती हो । विश्वरूपा हो,
इसलिये सम्पूर्णं विश्वको धारण करती हो । तुम भगवान् विश्वनाथकी भी वन्दनीया
हो। जो लोग भक्तिपूर्वक तुम्हारे सामने मस्तक झुकाते हैं, वे सम्पूर्णं विश्वको
आश्रय देनेवाले होते हैं ॥ ३३ ॥ देवि ! प्रसनन होओ। जैसे इस समय असुका वध
करके तुमने शीघ्र ही हमारी रक्षा की है, उसी प्रकार सदा हमें शत्रुओंके भयसे
बचाओ सम्पूर्ण जगत्का पाप नष्ट कर दो और उत्पात एवं पापोके फलस्वरूप
हमपर प्रसन्न होओ। त्रिलोकनिवासियोकौ पूजनीया परमेश्वरि! सब
देवी बोलीं--॥ ३६॥ देवताओ! मैं वर देनेको तैयार हूँ। तुम्हारे मनमें
जिसकी इच्छा हो, वह वर माँग लो। संसारके लिये उस उपकारक वरको
देवता बोले--॥ ३८॥ सर्वेश्वरि! तुम इसी प्रकार तीनों लोकोंकी समस्त
देवी बोलीं--॥४०॥ देवताओ! वैवस्वत मन्वन्तरके अट्टाईसवें युगमें
शुम्भ और निशुम्भ नामके दो अन्य महादैत्य उत्पन्न होंगे॥४१॥ तब मैं
नन्दगोपके घरमें उनकी पत्नी यशोदाके गर्भसे अवतीर्णं हो विन्ध्याचलमें जाकर
दानवोंका वध करूगी ॥ ४३ ॥ उन भयंकर महादैत्योको भक्षण करते समय मेरे
दाँत अनारके फूलको भाँति लाल हो जार्येगे ॥ ४४॥ तब स्वर्गे देवता और
फिर जब पृथ्वीपर सौ वर्षोके लिये वर्षा रुक जायगी और पानीका अभाव हो
जायगा, उस समय मुनियोके स्तवन करनेपर मैं पृथ्वीपर अयोनिजारूपमें प्रकट
होगी ॥ ४६॥ ओर सौ नेत्रोंसे मुनियोंको देखंगी। अतः मनुष्य ' शताक्षी ' इस
नामसे मेरा कीर्तन करेगे ॥ ४७॥ देवताओ! उस समय मैं अपने शरीरसे उत्पन्न
हुए शाकोंद्वारा समस्त संसारका भरण-पोषण करूँगी। जबतक वर्षा नहीं होगी,
ऐसा करनेके कारण पृथ्वीपर 'शाकम्भरी' के नामसे मेरी ख्याति होगी ।
उसी अवतारमें मैं दुर्गम नामक महादैत्यका वध भी करूँगी॥ ४९॥ इससे
मेरा नाम ' दुगदिवी' के रूपसे प्रसिद्ध होगा। फिर मैं जब भीमरूप धारण करके
मुनियोंकी रक्षाके लिये हिमालयपर रहनेवाले राक्षसोंका भक्षण करूगी, उस
समय सब मुनि भक्तिसे नतमस्तक होकर मेरी स्तुति करेगे ॥५०-५१॥
तब मेरा नाम “भीमादेवी' के रूपमे विख्यात होगा। जब अरुण नामक दैत्य
तीनों लोकोंमें भारी उपद्रव मचायेगा ॥ ५२॥ तब मैं तीनों लोकोका हित
करनेके लिये छः पैरोवाले असंख्य भ्रमरोका रूप धारण करके उस महादैत्यका
प्रकार जब-जब संसारमें दानवी बाधा उपस्थित होगी, तब-तब अवतार लेकर
मैं शत्रुओंका संहार करूगी ॥ ५४-५५॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमे सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके
अन्तर्गत देवीगाहात्म्यमें 'देवीस्तुति" नामक